
गांव की चौपाल से डिजिटल खदान तक… हिंदुस्तान जिंक की महिलाएं लिख रहीं आत्मनिर्भरता और आजादी की नई कहानी
‘सखी’ पहल से 25 हजार से अधिक ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ीं
महिलाओं को बचत, ऋण, कौशल, उद्यमिता और आजीविका के मिल रहे अवसर
फरजाना करीब 3.47 लाख रुपये सालाना अर्जित कर रही आय
प्रेम बाई व्यास ने डेयरी उत्पादन 10 से बढ़ाकर करीब 85 लीटर प्रतिदिन किया
हिंदुस्तान जिंक के कुल कार्यबल में 26.3 प्रतिशत महिलाएं
62 प्रतिशत कर्मचारी 35 वर्ष से कम आयु के हैं
महिलाएं भूमिगत खदानों, भारी मशीनरी, माइन रेस्क्यू और उत्पादन प्रक्रियाओं में काम कर रही हैं
महिलाएं AI, मशीन लर्निंग, ऑटोमेशन और डिजिटलीकरण जैसे क्षेत्रों में कर रहीं नेतृत्व
सोनिया,
उदयपुर, dusrikhabar.com। आजादी का अर्थ केवल अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने, अपनी आय अर्जित करने और अपने सपनों को पूरा करने का अवसर भी है। इसी आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की कहानी राजस्थान के गांवों से लेकर आधुनिक खदानों और स्मेल्टर्स तक दिखाई दे रही है।
हिंदुस्तान जिंक की विभिन्न पहलों से जुड़ी महिलाएं अब सिर्फ परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में सहयोगी नहीं रह गई हैं, बल्कि उद्यमी, डेयरी संचालक, इंजीनियर, मशीन ऑपरेटर, तकनीकी विशेषज्ञ और डिजिटल बदलाव की अगुआ बन रही हैं। कंपनी के अनुसार, ‘सखी’ पहल से 25 हजार से अधिक ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ चुकी हैं, जबकि कंपनी के कुल कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 26.3 प्रतिशत है, जो देश के मेटल एवं माइनिंग सेक्टर में सबसे अधिक बताई गई है।
बचत से शुरू हुआ सफर, अब अपने कारोबार तक पहुंचीं ग्रामीण महिलाएं
राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की शुरुआत अक्सर छोटे कदमों से होती है। कभी बचत समूह से जुड़ना, कभी कौशल सीखना और कभी छोटा कारोबार शुरू करना—इन्हीं कदमों को बड़े अवसरों में बदलने के लिए हिंदुस्तान जिंक की ‘सखी’ पहल काम कर रही है। इस पहल के तहत 25 हजार से अधिक ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। उन्हें बचत, ऋण, उद्यमिता प्रशिक्षण और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
इस बदलाव की तस्वीर फरजाना की कहानी में दिखाई देती है। सखी उत्पादन समिति से जुड़ी फरजाना ने घरेलू श्रम तक सीमित रहने के बजाय परिधानों और एफएमसीजी उत्पादों के निर्माण में अपना स्थान बनाया। आज वह करीब 3.47 लाख रुपये सालाना आय अर्जित कर रही हैं। कोविड-19 के कठिन दौर में भी उन्होंने अपनी क्षमता का परिचय दिया। उनकी इकाई ने कपड़े के मास्क तैयार किए, जिससे उनकी आय का सिलसिला जारी रहा और साथ ही समाज की एक जरूरी आवश्यकता भी पूरी हुई। फरजाना की कहानी बताती है कि अवसर मिले तो हुनर आत्मनिर्भरता में बदल सकता है।
10 लीटर से 85 लीटर दूध तक… प्रेम बाई की डेयरी ने बदली जिंदगी
महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता की एक और कहानी मटून गांव की प्रेम बाई व्यास की है। ‘समाधान’ पहल से जुड़कर उन्होंने अपने डेयरी व्यवसाय को नई दिशा दी। कुछ समय पहले तक वह प्रतिदिन करीब 10 लीटर दूध बेचती थीं और भुगतान के लिए बिचौलियों पर निर्भर रहती थीं। प्रशिक्षण और सहयोग के बाद उनके कारोबार का दायरा तेजी से बढ़ा।
आज प्रेम बाई करीब 85 लीटर दूध प्रतिदिन बेच रही हैं और उनकी मासिक आय 90 हजार रुपये से अधिक हो गई है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब उन्हें दूध का भुगतान सीधे बैंक खाते में मिलता है। वह स्वयं 20 पशुओं वाली डेयरी का संचालन कर रही हैं। यह बदलाव सिर्फ आय बढ़ने की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की तस्वीर है जिसमें एक महिला अपने व्यवसाय का निर्णय खुद लेती है, बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ती है और अपने परिवार की आर्थिक मजबूती में बड़ी भूमिका निभाती है।
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गांव की महिलाओं से लेकर खदानों की इंजीनियरिंग टीम तक
महिला सशक्तीकरण का यह सफर केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। हिंदुस्तान जिंक के कार्यस्थलों पर भी महिलाएं अब उन जिम्मेदारियों को संभाल रही हैं, जिन्हें पारंपरिक रूप से पुरुषों से जोड़ा जाता रहा है।
कंपनी के कुल कार्यबल में 26.3 प्रतिशत महिलाएं हैं। कंपनी के अनुसार यह संख्या भारत के मेटल एवं माइनिंग उद्योग में सबसे अधिक है। वहीं 62 प्रतिशत कर्मचारी 35 वर्ष से कम उम्र के हैं, जिससे कंपनी का कार्यबल युवा और समावेशी नजर आता है। आज कंपनी में महिलाएं भूमिगत खदानों में काम कर रही हैं, भारी मशीनरी संचालित कर रही हैं, उत्पादन प्रक्रियाओं को संभाल रही हैं और माइन रेस्क्यू टीमों का हिस्सा बन रही हैं।
इसके साथ ही महिलाएं AI, मशीन लर्निंग, ऑटोमेशन और डिजिटलीकरण जैसे तेजी से बदलते तकनीकी क्षेत्रों में भी जिम्मेदारियां संभाल रही हैं।
‘तेजस्विनी’ ने स्मेल्टर में महिलाओं के नेतृत्व को दी नई पहचान
महिलाओं की तकनीकी भागीदारी को बढ़ाने वाली कंपनी की ‘तेजस्विनी’ पहल के अंतर्गत चंदेरिया स्मेल्टिंग कॉम्प्लेक्स के लीचिंग एवं प्यूरिफिकेशन सेक्शन में महिलाओं की टीम विभिन्न शिफ्टों में संचालन की जिम्मेदारी संभाल रही है। यह बदलाव केवल कार्यबल में महिलाओं की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है। इससे मैन्युफैक्चरिंग जैसे तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं के नेतृत्व और निर्णय क्षमता को भी मजबूती मिली है। जहां कभी महिलाओं की भूमिका कुछ पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित मानी जाती थी, वहीं अब वे औद्योगिक उत्पादन की महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
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AI और मशीन लर्निंग से बदल रही हैं स्मेल्टर की कार्यप्रणाली
देबारी जिंक स्मेल्टर में कार्यरत स्वप्निल थोरी, जो आईआईटी दिल्ली से स्नातक हैं, डिजिटलाइजेशन विभाग का नेतृत्व कर रही हैं। वह AI और मशीन लर्निंग आधारित समाधानों के माध्यम से स्मेल्टर्स और पावर प्लांट्स में तकनीकी बदलाव को आगे बढ़ा रही हैं। उनके नवाचारों से प्रक्रिया दक्षता, प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस और संसाधनों के बेहतर उपयोग में योगदान मिला है। उनके और उनकी टीम के काम को कई सम्मान भी प्राप्त हुए हैं।
स्वप्निल की भूमिका यह दिखाती है कि आज महिला नेतृत्व केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। महिलाएं अब उस तकनीक को भी दिशा दे रही हैं, जो भविष्य के उद्योगों को आकार दे रही है।
‘आजादी’ का एक अर्थ आर्थिक आत्मनिर्भरता भी है
हिंदुस्तान जिंक के सीईओ अमरेंदु प्रकाश के अनुसार, देश की स्वतंत्रता ने भारत को अपना भविष्य खुद गढ़ने की आजादी दी, जबकि आर्थिक स्वतंत्रता व्यक्ति को अपने जीवन को बेहतर बनाने की ताकत देती है। उनका कहना है कि कंपनी की जिम्मेदारी केवल आर्थिक मूल्य पैदा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे अवसर तैयार करना भी है, जिनसे लोग आगे बढ़ सकें।
चाहे कोई ग्रामीण महिला अपना व्यवसाय शुरू करे या कोई युवा महिला आधुनिक उद्योग में तकनीकी नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाले, कंपनी महिलाओं को आजीविका, आकांक्षाओं और नेतृत्व के नए अवसर देने की दिशा में काम करने की प्रतिबद्धता जता रही है।
एक बदलाव जो गांव से उद्योग और आजीविका से नेतृत्व तक पहुंच रहा है
हिंदुस्तान जिंक की पहल की मानवीय तस्वीर यही है कि महिला सशक्तीकरण को केवल रोजगार या आय के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। जब फरजाना अपने हुनर से आय अर्जित करती हैं, प्रेम बाई अपनी डेयरी को 10 लीटर से 85 लीटर प्रतिदिन तक पहुंचाती हैं और स्वप्निल थोरी AI व मशीन लर्निंग से औद्योगिक प्रक्रियाओं को बदलने में नेतृत्व करती हैं, तो यह आर्थिक स्वतंत्रता से आत्मविश्वास और आत्मविश्वास से नेतृत्व तक पहुंचने वाली यात्रा बन जाती है।
शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य, सामुदायिक विकास और महिला सशक्तीकरण के माध्यम से हिंदुस्तान जिंक का लक्ष्य विकास के लाभों को अपने परिचालन क्षेत्रों से आगे समुदायों और समाज तक पहुंचाना है। विकसित भारत 2047 की दिशा में यह सोच इस बात को रेखांकित करती है कि देश की विकास यात्रा तभी मजबूत होगी, जब उसमें महिलाएं बराबर की भागीदार और नेतृत्वकर्ता होंगी।
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