
“हिमालय की बर्फ पीछे हट रही है, सवाल सिर्फ पहाड़ों का नहीं, आने वाली पीढ़ियों के पानी का”
उत्तराखंड के भारतीय मध्य हिमालय के 23 प्रमुख ग्लेशियरों का अध्ययन
समीक्षा में 25,621.01 मीटर का संचयी recession दर्ज किया गया
छोटे ग्लेशियरों में क्षेत्रफल घटने की चिंता सामने आई
ग्लेशियरों की स्थिति पर तापमान के साथ भू-आकृति, मलबा, ढलान और दिशा का भी असर
मिलम ग्लेशियर के सामने glacial lakes बनने की सूचना मिली
विजय श्रीवास्तव।
जयपुर/देहरादून, dusrikhabar.com। उत्तराखंड के हिमालय से सामने आई नई वैज्ञानिक समीक्षा सिर्फ बर्फ के पिघलने की कहानी नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के पानी, पर्यावरण और पहाड़ों के बदलते स्वरूप की चेतावनी भी देती है। Discover Geoscience में प्रकाशित समीक्षा के अनुसार भारतीय मध्य हिमालय के 23 प्रमुख ग्लेशियरों में कुल 25,621.01 मीटर का संचयी पीछे हटना दर्ज किया गया है। अध्ययन में अलग-अलग ग्लेशियरों की रफ्तार में बड़ा अंतर सामने आया है और खातलिंग ग्लेशियर 88 मीटर प्रति वर्ष की दर के साथ सबसे तेज पीछे हटने वाले ग्लेशियरों में शामिल है।
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बर्फ का पीछे हटना, पहाड़ों के भविष्य का संकेत
UPES, देहरादून और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के शोधकर्ताओं की समीक्षा में 1990 से 2024 के बीच उपलब्ध वैज्ञानिक शोध, फील्ड सर्वे, सैटेलाइट इमेजरी और डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) समेत विभिन्न स्रोतों का विश्लेषण किया गया।
रिव्यू में 23 ग्लेशियरों का कुल संचयी recession 25.62 किलोमीटर दर्ज किया गया। समीक्षा की समरी टेबल के अनुसार इन ग्लेशियरों की औसत retreat rate 24.63 मीटर प्रति वर्ष रही, जबकि अध्ययन के एक हिस्से में 23.23 मीटर प्रति वर्ष का औसत उल्लेख है। यह अंतर अध्ययन में दिए गए अलग-अलग गणना संदर्भों से जुड़ा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि 25.62 किलोमीटर का आंकड़ा अलग-अलग ग्लेशियरों और अलग-अलग अध्ययन-अवधियों के संचयी recession को दर्शाता है, इसे सभी 23 ग्लेशियरों के लिए एक समान अवधि में हुए नुकसान के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
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खातलिंग सबसे तेज पीछे हटने वाले ग्लेशियरों में
टिहरी गढ़वाल का खातलिंग ग्लेशियर इस समीक्षा में सबसे तेज retreat rate वाले ग्लेशियरों में सामने आया है। 1965 से 2014 के बीच इसकी औसत पीछे हटने की दर करीब 88 मीटर प्रति वर्ष रही और इस दौरान इसका स्नाउट लगभग 4.34 किलोमीटर पीछे खिसका।
पुराने अध्ययन के अनुसार इस बदलाव के साथ खातलिंग ग्लेशियर का एक बड़ा संयुक्त हिस्सा कई छोटे ग्लेशियरों में fragmented हो गया।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लेशियर का पीछे हटना केवल बर्फ के कम होने तक सीमित नहीं रहता। इससे हिमनदीय भू-दृश्य, जल प्रवाह और आगे चलकर पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।
पिंडारी से मिलम और गंगोत्री तक अलग-अलग तस्वीर
समीक्षा में अलग-अलग ग्लेशियरों की retreat rate में काफी अंतर सामने आया है।
- पिंडारी ग्लेशियर: करीब 45.8 मीटर/वर्ष
- मिलम ग्लेशियर: करीब 37.8 मीटर/वर्ष
- गंगोत्री ग्लेशियर: करीब 22 मीटर/वर्ष
- चोराबाड़ी ग्लेशियर: करीब 6.8 मीटर/वर्ष
- भागीरथी ग्लेशियर: करीब 3.7 मीटर/वर्ष
इससे स्पष्ट होता है कि हिमालय के सभी ग्लेशियर एक ही गति से नहीं बदल रहे हैं। ग्लेशियर की ऊंचाई, ढलान, आकार, दिशा, सतह पर मौजूद मलबा और स्थानीय जलवायु जैसी कई परिस्थितियां उसकी retreat rate को प्रभावित करती हैं।
ग्लेशियर पर जमा मलबा भी बदल देता है पिघलने की रफ्तार
अध्ययन की एक अहम बात यह है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने की कहानी को केवल बढ़ते तापमान से नहीं समझा जा सकता।
ग्लेशियर की सतह पर जमा supraglacial debris यानी चट्टानी मलबा कई परिस्थितियों में बर्फ को इंसुलेट करता है और सतही पिघलाव की गति को कम कर सकता है। इसी कारण debris-covered glaciers और साफ बर्फ वाले ग्लेशियरों की retreat rate में अंतर देखा जाता है।
इसके अलावा ग्लेशियर का आकार, ऊंचाई, ढलान और orientation भी उसकी प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिक समीक्षा में दक्षिणमुखी ग्लेशियरों में सिकुड़न से जुड़े अंतर का भी उल्लेख किया गया है।
मिलम ग्लेशियर के सामने बनीं कई ग्लेशियल झीलें
मिलम ग्लेशियर में 2004 से 2014 के बीच करीब 480 मीटर retreat दर्ज किया गया। समीक्षा में इसके सामने लगभग 47 glacial lakes बनने की सूचना भी दी गई है।
अध्ययन के अनुसार lake-terminating glaciers की औसत retreat rate करीब 34.9 मीटर प्रति वर्ष, जबकि land-terminating glaciers की करीब 22.5 मीटर प्रति वर्ष रही। शोधकर्ताओं के अनुसार यह अंतर glacier lake में calving और ice-water interaction की भूमिका की ओर संकेत करता है।
हालांकि, इस अध्ययन ने किसी विशेष गांव के लिए इसे quantified GLOF risk के रूप में निर्धारित नहीं किया है।
छोटे ग्लेशियरों पर ज्यादा असर
वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक मनीष मेहता से जुड़े अध्ययन के अनुसार Upper Alaknanda Basin में 1994 से 2020 के बीच glacierized area में 4.2 ± 2.9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
इसी क्षेत्र में ग्लेशियरों के स्नाउट के पीछे हटने की दर करीब 9.3 मीटर प्रति वर्ष से बढ़कर 13.3 मीटर प्रति वर्ष हुई। वहीं, 1994 के बाद snowline भी लगभग 100 मीटर ऊपर गई।
खास चिंता छोटे ग्लेशियरों को लेकर है। 0.5 वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियरों में क्षेत्रफल में 15 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। समीक्षा के मुताबिक 2000 के बाद कई ग्लेशियरों में retreat और ELA rise की गति बढ़ी, हालांकि हर ग्लेशियर की प्रतिक्रिया अलग रही।
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हिमालय की बर्फ सिर्फ पहाड़ों की खूबसूरती नहीं
मानवीय नजरिए से देखें तो ग्लेशियर सिर्फ हिमालय की चोटियों पर जमी बर्फ नहीं हैं। वे नदियों, जलस्रोतों, पहाड़ी समुदायों और मैदानी इलाकों की जल व्यवस्था से जुड़े प्राकृतिक भंडार हैं।
इसलिए ग्लेशियर का पीछे हटना एक दूर पहाड़ पर होने वाला बदलाव भर नहीं है। इसका संबंध उस पानी से भी है जो पहाड़ों से निकलकर नीचे रहने वाले लोगों तक पहुंचता है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों के लिए ग्लेशियरों की निगरानी, लगातार satellite observation और field-based studies भविष्य के जल-सुरक्षा आकलन में महत्वपूर्ण हैं।
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