
कौन संभालेगा उदयपुर आरटीडीसी के ‘कमाऊ पूत’ कजरी की कमान?, इस बड़े खुलासे की चर्चा का बाजार गर्म
उदयपुर होटल कजरी इकाई प्रभारी नियुक्ति को लेकर बढ़ी हलचल
क्या राजनीतिक पहुंच पड़ेगी प्रशासनिक योग्यता पर भारी?
होटल कजरी जीएम नियुक्ति पर सस्पेंस से उठने जा रहा पर्दा
शेखावाटी के अधिकारी का नाम सबसे आगे, राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा गर्म
खाटूश्यामजी दर्शन से बढ़ीं चर्चाएं, क्या नियुक्ति से पहले साधी जा रही है सियासी और आध्यात्मिक रणनीति?
योग्यता बनाम राजनीतिक पहुंच के बीच होटल कजरी में नियुक्ति से पर्यटन विभाग सुर्खियों में
कर्मचारियों और पर्यटन उद्योग की नजरें फैसले पर
विजय श्रीवास्तव,
जयपुर, Dusrikhabar.com। राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) के प्रतिष्ठित होटल कजरी, उदयपुर में इकाई प्रभारी पद की संभावित नियुक्ति को लेकर विभागीय और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। सूत्रों के अनुसार आदेश रविवार देर रात या सोमवार सुबह तक जारी हो सकते हैं। इस बीच नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक पहुंच, लॉबिंग और प्रशासनिक योग्यता के बीच संतुलन को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
संभावित नियुक्ति आदेशों को लेकर बढ़ी हलचल
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार होटल कजरी के जीएम पद पर नई नियुक्ति के आदेश जल्द जारी हो सकते हैं। विभागीय स्तर पर लंबे समय से इस पद को लेकर चर्चाएं चल रही थीं और अब अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा की जा रही है। गौरतलब है कि एक अफसर की हाल में उदयपुर दौरे पर मुख्य सचिव और डिप्टी सीएम थपथपा चुके पीठ। अब उन्हें भी ऊंट की करवट का इंतजार है।
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राजनीतिक लॉबिंग और प्रभाव की चर्चाएं
राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि प्रदेश के मुखिया एवं सह मुखिया स्तर तक प्रभावी लॉबिंग नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस तरह की चर्चाएं एक बार फिर सरकारी उपक्रमों में नियुक्तियों पर राजनीतिक हस्तक्षेप के सवालों को हवा दे रही हैं। सुनने में तो यहां तक आया है कि सह मुखिया के सिपहसालार के करीबी होने का भी एक अफसर को मिल सकता लाभ। इस बीच दस्तरखान पर कुछ विभागीय अफसरों में एक बहस चल पड़ी कि सिपहसालार बड़े ही संजीदा व्यक्तित्व के धनी हैं उनका झुकाव सिर्फ योग्यता और अनुभव की ओर है।
लाभ के पदों पर बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप पर उठ रहे सवाल
सरकारी निगमों और लाभ के पदों पर नियुक्तियों में राजनीतिक प्रभाव की चर्चाएं नई नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियुक्तियों में योग्यता, अनुभव और प्रदर्शन की बजाय राजनीतिक समीकरण हावी होते हैं तो इससे संस्थानों की कार्यकुशलता और पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। होटल कजरी की संभावित नियुक्ति को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
शेखावाटी क्षेत्र के अधिकारी का नाम सबसे आगे
जानकार सूत्रों का दावा है कि शेखावाटी क्षेत्र स्थित एक आरटीडीसी होटल में कार्यरत अधिकारी इस दौड़ में सबसे आगे बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि उनकी प्रशासनिक सक्रियता और उच्च स्तर तक पहुंच ने उन्हें अन्य दावेदारों पर बढ़त दिलाई है।
खाटूश्याम मंदिर में विशेष दर्शन करने पहुंचे अधिकारी
हालांकि अभी तक सिर्फ अटकलों का दौर चल रहा है। किस अफसर को विभाग के इस कमाऊपूत की जिम्मेदारी मिलेगी फिलहाल तय नहीं है। लेकिन सूत्रों की मानें तो राजनीतिक आकाओं के ईशारे के बाद ही सब कुछ संभव है। शायद यही कारण है कि ये अफसर खाटू श्यामजी मंदिर में शनिवार शाम विशेष दर्शन कर अपनी अरदास लगाने पहुंचे हैं। गौरतलब है कि ये एक व्यक्तिगत धार्मिक यात्रा भी हो सकती है। लेकिन विभाग के पुराने चावल ये मानने को तैयार नहीं है कि इस ये व्यक्तिगत यात्रा है।
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कर्मचारियों और पर्यटन क्षेत्र की नजरें फैसले पर
उदयपुर के पर्यटन उद्योग और आरटीडीसी कर्मचारियों की निगाहें अब अंतिम आदेशों पर टिकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि नियुक्त होने वाला अधिकारी होटल कजरी की प्रतिष्ठा, राजस्व और सेवा गुणवत्ता को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में कितना सफल रहेगा। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि चयन का आधार प्रशासनिक क्षमता बनती है या फिर राजनीतिक समीकरण।
कर्मचारियों की उम्मीदें और संस्थान की साख
किसी भी सरकारी संस्थान की सफलता केवल शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी से नहीं, बल्कि पूरी टीम के विश्वास और मनोबल से तय होती है। ऐसे में होटल कजरी के कर्मचारियों और पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों की अपेक्षा है कि निर्णय संस्थान के हित, योग्यता और बेहतर प्रशासनिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते हुए लिया जाए, ताकि पर्यटन क्षेत्र को सकारात्मक संदेश मिल सके।
विभाग के पास प्रदीप बोहरा के एक्सपेरीमेंट का बड़ा उदाहरण
बहरहाल उदयपुर स्थित होटल कजरी में ईकारी प्रभारी पद पर नियुक्ति किसी की भी हो लेकिन वहां के लोकल स्टाफ का भी ये मानना है कि दुधारू गाय का मालिक हर कोई बनना चाहता है, लेकिन उसे दुधारू बनाए रखने मेंं मेहनत और जी जान लगाना पड़ता है। विभाग में अंदर ही अंदर ये भी चर्चा है कि किसी उपयुक्त और अनुभवी अफसर जो यहां की रग रग से वाकिफ हो को इसकी जिम्मेदारी देकर फाइनेंशियल पावर वर्तमान में कार्यरत किसी स्थानीय अफसर को दिए जा सकते हैं ऐसा करने से विभाग को नए लाव लश्कर की जरूरत नहीं पड़ेगी या फिर कोई ऐसा अधिकारी जो उदयपुर के हवा को पहचानाता हो वाहें इस गाय का मालिक बने तो कमाऊ पूत वाली प्रथा बरकरार रहेगी। उल्लेखनीय है कि विभाग के पास प्रदीप बोहरा का बड़ा उदाहरण है जिसने अफसरों के फैसलों को सही साबित किया था।
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