पांचना बांध पर फिर उफान में सियासत: हाईकोर्ट के आदेश दरकिनार, गरमाई गुर्जर-मीणा राजनीति…!

पांचना बांध पर फिर उफान में सियासत: हाईकोर्ट के आदेश दरकिनार, गरमाई गुर्जर-मीणा राजनीति…!

करौली के पांचना बांध पर गुर्जर-मीणा समीकरण से गरमाई प्रदेश की राजनीति

हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं छोड़ा गया पानी

39 गांवों के किसान दे रहे पानी पर पहरा, तो 35 गांवों के किसान आंदोलन की राह पर 

राजनेताओं को मिला एक और मुद्दा, क्या कांग्रेस भुना पाएगी इस मुद़्दे को

विजय श्रीवास्तव,

जयपुर, dusrikhabar.com। राजस्थान के करौली जिले में स्थित पांचना बांध का विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। हाईकोर्ट के तीसरी बार सख्त रुख अपनाने के बावजूद बांध का पानी अब तक कमांड क्षेत्र की नहरों तक नहीं पहुंच पाया है। एक ओर बांध के डूब क्षेत्र के 39 गांवों के लोग पानी रोककर पहरा दे रहे हैं, तो दूसरी ओर 35 से अधिक गांवों के किसान अपने हिस्से के पानी की मांग को लेकर धरने पर बैठे हैं।

पिछले दो दशकों से चल रहा यह विवाद अब केवल सिंचाई या जल वितरण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति, जातीय समीकरण और चुनावी रणनीतियों का केंद्र बन चुका है।

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हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद नहीं निकला समाधान

राजस्थान हाईकोर्ट ने मई 2026 में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि पांचना बांध का पानी जल्द से जल्द कमांड क्षेत्र की नहरों में छोड़ा जाए। यह पहला मौका नहीं है जब अदालत ने ऐसा आदेश दिया हो। पिछले करीब 20 वर्षों में तीसरी बार अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा है।

इसके बावजूद प्रशासन और सरकार न तो पानी मांग रहे किसानों को उनका अधिकार दिला पाई है और न ही डूब क्षेत्र के गांवों की आपत्तियों का स्थायी समाधान निकाल सकी है। नतीजा यह है कि बांध का पानी एक बार फिर ‘नजरबंद’ बना हुआ है।

क्या है पांचना बांध विवाद की जड़?

पांचना बांध पूर्वी राजस्थान का सबसे बड़ा मिट्टी का बांध माना जाता है। इसका निर्माण भद्रावती, बरखेड़ा, माचकी, भैसावट और अटाकी नदियों के जल को रोककर किया गया था।

विवाद की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई, जब बांध निर्माण में अपनी जमीन गंवाने वाले किसानों ने पानी पर पहला अधिकार जताते हुए नहरों में पानी छोड़ने का विरोध शुरू कर दिया। उनका तर्क है कि जिन गांवों की जमीनें डूब क्षेत्र में गईं, उन्हें अब तक बांध का लाभ नहीं मिला।

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दूसरी ओर कमांड क्षेत्र के किसान दावा करते हैं कि उन्हें 1992 से 2005 तक नहरों के माध्यम से सिंचाई का पानी मिलता रहा है और वे अपने वैधानिक अधिकार की मांग कर रहे हैं।

एक बांध, दो आंदोलन और आमने-सामने किसान

वर्तमान में विवाद दो अलग-अलग धरनों के रूप में दिखाई दे रहा है।

डूब क्षेत्र के गांवों का पहरा

पांचना-गुडला संघर्ष समिति के नेतृत्व में 39 गांवों के लोग 16 मई से बांध स्थल पर निगरानी धरना दे रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने वर्षों पहले लिफ्ट परियोजना के जरिए पानी उपलब्ध कराने का वादा किया था, लेकिन आज तक वह पूरा नहीं हुआ।

समिति के अध्यक्ष अशोक सिंह धाभाई का आरोप है कि बांध निर्माण के दौरान मूल योजना से हटकर कमांड क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई, जबकि जिन गांवों ने जमीन दी, वे आज भी पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

कमांड क्षेत्र के किसानों का आंदोलन

दूसरी ओर गंगापुर सिटी और करौली क्षेत्र के करीब 35 गांवों के किसान खंडीप गांव में धरने पर बैठे हैं। इन किसानों की मांग है कि हाईकोर्ट के आदेश का तत्काल पालन किया जाए और नहरों में पानी छोड़ा जाए।

कमांड क्षेत्र के आंदोलन का नेतृत्व गंगापुर सिटी विधायक रामकेश मीणा कर रहे हैं। उनका कहना है कि अदालत के आदेश के बावजूद सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है।

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पांचना विवाद में कैसे घुसी जातीय राजनीति?

पानी के इस संघर्ष ने धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक रंग भी ले लिया है। क्षेत्र में दोनों पक्षों को अलग-अलग जातीय समूहों से जोड़कर देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डूब क्षेत्र के आंदोलन में गुर्जर समुदाय की मजबूत भागीदारी है, जबकि कमांड क्षेत्र के आंदोलन को मीणा समुदाय का समर्थन प्राप्त है। यही कारण है कि पानी का मुद्दा अब सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण का रूप लेता जा रहा है।

हालांकि दोनों पक्ष अपने आंदोलन को किसानों के अधिकारों का संघर्ष बताते हैं, लेकिन स्थानीय राजनीति में इसे गुर्जर बनाम मीणा समीकरण के चश्मे से देखा जा रहा है।

नेताओं की सक्रियता से बढ़ी राजनीतिक गर्माहट

पांचना विवाद ने स्थानीय नेताओं को भी सक्रिय कर दिया है। एक ओर संघर्ष समिति सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि हाईकोर्ट के आदेश के पालन की मांग कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विवाद जल्द नहीं सुलझा तो यह आगामी स्थानीय निकाय और विधानसभा राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है। दोनों समुदायों का क्षेत्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव होने के कारण राजनीतिक दल भी इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं।

किसने क्या कहा?

  • कांग्रेस की प्रतिक्रिया: पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने राज्य सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह दोनों पक्षों (गुर्जर और मीणा) को बातचीत के लिए बुलाने में विफल रही है और इसे जानबूझकर जातिगत विवाद में बदलने का प्रयास कर रही है। 
  • स्थानीय नेताओं का रुख: गंगापुर सिटी के विधायक रामकेश मीणा कमांड एरिया में पानी छोड़े जाने की खुलकर पैरवी कर रहे हैं और वर्तमान सरकार पर गुर्जर समुदाय का पक्ष लेने का आरोप लगाते हैं। दूसरी ओर, गुर्जर नेता (जैसे हाकिम बैंसला) अपने अधिकारों की मांग को लेकर महापंचायतों का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होने 411 गांवों की महापंचायत बुलाकर यह तक कह दिया कि गहलोत हमारे समर्थन में हैं। 
  • कृषि मंत्री किरोड़ी मीणा का बयान: मुख्यमंत्री से मुलाकात के दौरान मैंने पांचना बांध की वर्तमान स्थिति पर विस्तार से चर्चा की तथा बांध की नहरों में जल्द पानी छोड़े जाने की मांग रखी। हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश होने के बावजूद पिछले कई वर्षों से कमांड क्षेत्र की नहरों में पानी नहीं पहुंचाया गया है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। पानी की कमी के कारण 9,985 हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचाई से वंचित है और लगभग 35 गांवों के 1.25 लाख से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं।

रेलवे ट्रैक रोकने तक पहुंचा आंदोलन

आंदोलन अब उग्र रूप लेने के संकेत दे रहा है। कमांड क्षेत्र के आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि 27 जून तक सरकार पानी छोड़ने की स्पष्ट योजना नहीं बताती है तो 28 जून से रेल रोको आंदोलन शुरू किया जाएगा।

बीते दिनों आंदोलनकारियों द्वारा दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शन किए जाने से प्रशासन की चिंता भी बढ़ गई है।

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सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती

सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाने की है। डूब क्षेत्र के गांव अपने पुनर्वास और पानी के अधिकार की मांग कर रहे हैं, जबकि कमांड क्षेत्र के किसान सिंचाई के लिए नहरों में पानी चाहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अदालत के आदेश या प्रशासनिक कार्रवाई से यह विवाद समाप्त नहीं होगा। इसके लिए डूब क्षेत्र और कमांड क्षेत्र दोनों के हितों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक जल प्रबंधन नीति और सर्वमान्य समाधान तैयार करना होगा।

बहरहाल, करीब दो दशक पुराना पांचना बांध विवाद अब केवल पानी के बंटवारे का मामला नहीं रह गया है। यह किसानों के अधिकार, विस्थापन की पीड़ा, सरकारी वादों, जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय राजनीति का जटिल मिश्रण बन चुका है। हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद यदि समाधान नहीं निकलता है तो आने वाले दिनों में यह विवाद राजस्थान की राजनीति और कानून-व्यवस्था दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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