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एथेनॉल पी गया गन्ने का रस अब चीनी कैसे मिले? देशभर में 15-25% महंगी हुई चीनी, कभी निर्यात करते थे अब आयात की मजबूरी…!

एथेनॉल पी गया गन्ने का रस अब चीनी कैसे मिले? देशभर में 15-25% महंगी हुई चीनी, कभी निर्यात करते थे अब आयात की मजबूरी…!

चीनी की मिठास पर महंगाई की मार…

दुनिया को चीनी बेचने वाला भारत आज घरेलू जरूरत के लिए आयात पर निर्भर क्यों?

50 दिनों में 19% बढ़े दाम, अब विदेश से मंगानी पड़ेगी 10 लाख टन चीनी

सरकारी औसत कीमत 55.7 रुपये किलो तक पहुंची, कई शहरों में फुटकर भाव 65-70 रुपए

1 अक्टूबर तक 35 लाख टन बच सकता स्टॉक, पिछले साल करीब 47 लाख टन था स्टॉक

मौसम की मार से गन्ने की शुगर रिकवरी 12% घटी

एथेनॉल उत्पादन में करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर गन्ने/उत्पाद इस्तेमाल होने का अनुमान

मई 2026 में रोक से पहले करीब 8 लाख टन चीनी निर्यात हो चुकी थी

बड़े खरीदारों और डीलरों के लिए स्टॉक लिमिट घटाई

नवंबर में नई फसल की पेराई शुरू होने के बाद आपूर्ति में सुधार की उम्मीद

गन्ने की कम पैदावार, एथेनॉल, घटता स्टॉक और त्योहारों की बढ़ती मांग ने बिगाड़ा गणित

विजय श्रीवास्तव,

जयपुर/नई दिल्ली, dusrikhabar.com। सुबह की चाय में घुली एक चम्मच चीनी आम आदमी को भले ही छोटी चीज लगे, लेकिन जब यही चीनी 50 दिनों में करीब 19 फीसदी महंगी हो जाए तो इसका असर सिर्फ चाय की प्याली तक सीमित नहीं रहता। मिठाई, बिस्किट, पेय पदार्थ, बेकरी और तमाम खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी इसका दबाव बढ़ने लगता है।

देश में चीनी की सरकारी औसत कीमत अब 55.7 रुपये किलो तक पहुंच गई है, जबकि कई शहरों में फुटकर दुकानों पर यही चीनी 65 से 70 रुपये किलो तक बिक रही है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ब्राजील के बाद दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल भारत को अब घरेलू बाजार की जरूरत पूरी करने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी विदेश से मंगानी पड़ रही है।

यह सिर्फ महंगाई की कहानी नहीं है। इसके पीछे मौसम, गन्ने की पैदावार, एथेनॉल नीति, चीनी का निर्यात, घटता स्टॉक और त्योहारी मांग का ऐसा चक्र है, जिसने देश के चीनी बाजार को दबाव में ला दिया है।

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चीनी की कीमत में इतनी तेजी आखिर आई कैसे?

करीब दो साल तक चीनी के दाम अपेक्षाकृत स्थिर रहे। लेकिन जून 2026 से बाजार में अचानक तेजी शुरू हो गई। इस समय देश त्योहारों की ओर बढ़ रहा है। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहार आते हैं। इस दौरान मिठाइयों से लेकर बेकरी और कन्फेक्शनरी उत्पादों तक में चीनी की खपत बढ़ जाती है। 

इस बार परेशानी यह है कि मांग बढ़ने के साथ बाजार में उपलब्ध स्टॉक भी काफी कम है। भारत में नया चीनी उत्पादन सीजन सामान्य तौर पर 1 अक्टूबर से शुरू होता है। तब तक पुराने स्टॉक से ही बाजार की जरूरत पूरी करनी होती है। आकलनों के मुताबिक इस बार 1 अक्टूबर 2026 तक मिलों के पास केवल करीब 35 लाख टन चीनी बचने की संभावना है, जो करीब तीन दशक में सबसे निचले स्तरों में से एक होगी। पिछले साल यह स्टॉक करीब 47 लाख टन था। यानी नए सीजन की शुरुआत से पहले ही बाजार के सामने उपलब्धता का सवाल खड़ा हो गया है।

गन्ना खेत में था, फिर भी चीनी कम क्यों बनी?

चीनी संकट की पहली कड़ी खेतों से जुड़ी है। पिछले साल अधिक बारिश और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का असर गन्ने की फसल पर पड़ा। इसका परिणाम सिर्फ गन्ने की मात्रा में कमी के रूप में नहीं आया, बल्कि गन्ने से चीनी निकलने की दर यानी Sugar Recovery Rate भी प्रभावित हुई। आसान शब्दों में समझें तो यदि 100 किलो गन्ने से सामान्य से कम चीनी निकलेगी तो बड़ी फसल होने के बावजूद बाजार में चीनी की उपलब्धता घट जाएगी। NFCSF के उपाध्यक्ष केतन पटेल के अनुसार, पिछले साल की अधिक बारिश से गन्ने को नुकसान हुआ और रिकवरी रेट 12 फीसदी से नीचे चला गया। इसका असर कुल उत्पादन पर पड़ा। चीनी उत्पादन करीब 3 करोड़ टन रहा, जबकि पहले करीब 3.2 करोड़ टन उत्पादन का अनुमान था। यानी समस्या सिर्फ गन्ने की मात्रा की नहीं थी, गन्ने से निकलने वाली चीनी की मात्रा भी कम हो गई। दूसरी तरफ गन्ने का एक हिस्सा चीनी नहीं, एथेनॉल बना रहा था

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यहां कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—एथेनॉल। भारत पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति को लगातार बढ़ावा दे रहा है। इसका मकसद पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना और किसानों के लिए गन्ने का एक अतिरिक्त बाजार तैयार करना है।लेकिन जब गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का एक हिस्सा चीनी बनाने की बजाय एथेनॉल में चला जाता है तो बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा स्वाभाविक रूप से प्रभावित होती है।

ICRA के अनुमान के अनुसार 2025-26 में कुल चीनी उत्पादन करीब 3.1 करोड़ टन रहने का अनुमान था, लेकिन नेट चीनी उत्पादन करीब 2.8 करोड़ टन रह गया। वहीं देश की अनुमानित खपत करीब 2.83 करोड़ टन थी। बताया गया है कि करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर गन्ने का शीरा/उत्पाद एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हुआ। 

यहीं से सरकार के सामने एक मुश्किल संतुलन पैदा होता है कि एथेनॉल उत्पादन भी बढ़ाना है और घरेलू बाजार में चीनी की कमी भी नहीं होने देनी है। 

जब स्टॉक कम था तो चीनी का निर्यात क्यों किया गयामौजूदा संकट का सबसे संवेदनशील सवाल यही है। केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में 15 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी। इसके बाद फरवरी 2026 में 5 लाख टन अतिरिक्त निर्यात की मंजूरी दी गई। 

बाद में घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ने लगीं तो मई 2026 में सरकार ने चीनी निर्यात पर रोक लगा दी। लेकिन तब तक करीब 8 लाख टन चीनी देश से बाहर जा चुकी थी। इसी अवधि में स्टॉक करीब 47 लाख टन से घटकर 39 लाख टन तक आने की बात सामने आई। चीनी उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि घरेलू आपूर्ति पर दबाव मार्च 2026 से ही दिखाई देने लगा था, लेकिन निर्यात पर रोक बाद में लगाई गई। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उस समय सरकार के पास उपलब्ध उत्पादन और स्टॉक के अनुमानों के आधार पर ही निर्यात की अनुमति दी गई थी। यानी आज का संकट सिर्फ कम उत्पादन का नहीं, बल्कि स्टॉक का सही आकलन करने की चुनौती का भी है।

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त्योहार आए तो बढ़ गई मांग, और बाजार में शुरू हुई स्टॉक की दौड़

अब आम आदमी की जेब से जुड़ी एक और वजह सामने आती है—त्योहारी मांग। अगस्त से नवंबर के बीच मिठाई की दुकानों, रेस्तरां, पेय पदार्थ और खाद्य कंपनियों को ज्यादा चीनी चाहिए। जब बाजार में यह धारणा बनने लगती है कि आने वाले दिनों में चीनी और महंगी हो सकती है, तो बड़े खरीदार अपनी जरूरत से पहले ही ज्यादा माल खरीदना शुरू कर देते हैं। यही स्टॉकिंग कीमतों पर और दबाव डालती है। कम स्टॉक + बढ़ती मांग + भविष्य में कीमत बढ़ने की आशंका = तेजी से बढ़ता बाजार भाव।

क्या चीनी अभी और महंगी हो सकती है?

इस सवाल का जवाब फिलहाल पूरी तरह निश्चित नहीं है, लेकिन अक्टूबर-नवंबर तक कीमतों पर दबाव बने रहने की आशंका जरूर है। बॉम्बे शुगर मर्चेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक जैन के मुताबिक त्योहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने के बीच मिलों द्वारा चीनी की बिक्री को नियंत्रित गति से जारी रखने से बाजार में दबाव बना हुआ है। नवंबर में जब नई फसल की पेराई शुरू होगी और नई चीनी बाजार में आने लगेगी, तब स्थिति में सुधार की उम्मीद है। लेकिन उससे पहले बाजार को मौजूदा स्टॉक से ही काम चलाना होगा।

यही कारण है कि अगले कुछ सप्ताह चीनी की कीमतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

महंगाई रोकने के लिए सरकार ने उठाए चार बड़े कदम।

सरकार ने 20 अगस्त 2026 को चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं।

  1. बड़े खरीदारों की स्टॉक सीमा घटाई

हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले बड़े खरीदारों के लिए अब 15 दिनों की स्टॉक सीमा तय की गई है। इसका उद्देश्य मिठाई और पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनियों सहित बड़े खरीदारों को जरूरत से ज्यादा चीनी जमा करने से रोकना है।

  1. बड़े व्यापारियों और सप्लायरों पर भी सीमा

बड़े सप्लायर और डीलर अब अधिकतम 4,000 क्विंटल चीनी का स्टॉक रख सकेंगे। सरकार की कोशिश है कि चीनी गोदामों में जमा रहने के बजाय बाजार में उपलब्ध रहे।

  1. चीनी मिलों को अतिरिक्त बिक्री की अनुमति

सरकार ने मिलों को सामान्य आवंटन से 50 हजार टन अधिक चीनी बाजार में बेचने की अनुमति दी है। साथ ही बिक्री के बाद चीनी को 7 दिन के भीतर मिल से बाहर भेजने का निर्देश दिया गया है। इसका उद्देश्य आपूर्ति की रफ्तार बढ़ाना और अनावश्यक स्टॉकिंग रोकना है।

  1. अब विदेश से आएगी 10 लाख टन कच्ची चीनी

सरकार का सबसे बड़ा कदम है 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति। यह आयात 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा और इस पर सामान्य आयात शुल्क में बड़ी राहत दी गई है। आम तौर पर चीनी के आयात पर 100 फीसदी तक शुल्क लगता है, लेकिन मौजूदा स्थिति में सरकार ने घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अगले दिन से बाजार में चीनी सस्ती हो जाएगी।

कच्ची चीनी को भारत लाकर रिफाइन करना होगा और फिर उसे घरेलू बाजार में भेजा जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में समय लगेगा।

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भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल: चीनी बेचने से खरीदने तक कैसे पहुंचा देश?

यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लंबे समय से दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल रहा है।2021-22 में भारत ने करीब 1.1 करोड़ टन चीनी का रिकॉर्ड निर्यात किया था। लेकिन अब वही देश घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए आयात कर रहा है। करीब एक दशक पहले 2017 में लगभग 24 लाख टन चीनी आयात की गई थी। उसके बाद भारत सामान्य तौर पर चीनी का आयातक देश नहीं रहा। आज 10 लाख टन कच्ची चीनी आयात करने का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि देश में उत्पादन, खपत और रणनीतिक स्टॉक के बीच संतुलन कितना नाजुक हो गया है।

क्या आयात से तुरंत राहत मिलेगी?

यह भी बड़ा सवाल है कि सरकार के फैसले से बाजार में मनोवैज्ञानिक दबाव कम हो सकता है और कारोबारियों को यह संकेत मिलेगा कि सरकार कमी को दूर करने के लिए तैयार है। लेकिन वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि विदेश से चीनी कितनी जल्दी भारत पहुंचती है और कितनी मात्रा में घरेलू बाजार में उपलब्ध होती है। CAIT के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर के मुताबिक कच्ची चीनी के बड़े निर्यातक देशों की संख्या सीमित है, इसलिए नवंबर से पहले पर्याप्त मात्रा में आयातित चीनी मिलना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

आम परिवार की थाली पर कितनी पड़ेगी मार?

चीनी महंगी होने का असर सिर्फ उस परिवार पर नहीं पड़ेगा जो महीने में 5-10 किलो चीनी खरीदता है। मिठाई, बिस्किट, केक, आइसक्रीम, चॉकलेट, सॉफ्ट ड्रिंक, जूस और दूसरे प्रोसेस्ड फूड बनाने वाली कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है। इसका असर दो तरह से सामने आ सकता है कि या तो उत्पाद महंगे होंगे, या कंपनियां पैकेट का वजन कम कर सकती हैं। यानी बाजार में चीनी की कीमत बढ़ने का असर कई बार ग्राहक को सीधे चीनी के पैकेट में दिखाई नहीं देता, बल्कि दूसरे खाद्य उत्पादों की कीमत या मात्रा में दिखाई देता है।

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आगे क्या होगा? तीन तारीखें तय करेंगी चीनी की कहानी

31 अगस्त से नवंबर तक त्योहारी मांग और उपलब्ध स्टॉक बाजार की दिशा तय करेंगे।, 31 अक्टूबर 2026 तक सरकार द्वारा मंजूर 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की समयसीमा महत्वपूर्ण होगी। नवंबर 2026 में नई फसल की पेराई शुरू होने के बाद घरेलू उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है। यही वह समय होगा जब बाजार में वास्तविक आपूर्ति का दबाव कम हो सकता है। 

चीनी महंगी होने की कहानी खेत से लेकर नीति तक जाती है:

आज चीनी के दाम बढ़ने के पीछे एक नहीं, कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं।

मौसम ने गन्ने को प्रभावित किया।
कम रिकवरी ने उत्पादन घटाया।
एथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल बढ़ा।
चीनी का निर्यात हुआ।
स्टॉक घटा।
त्योहारों ने मांग बढ़ाई और बाजार में स्टॉकिंग की आशंका ने कीमतों को और ऊपर धकेला।

सरकार ने अब स्टॉक लिमिट घटाने, मिलों से अतिरिक्त चीनी बाजार में लाने और 10 लाख टन कच्ची चीनी आयात करने जैसे कदम उठाए हैं। लेकिन असली राहत नवंबर में नई फसल आने के बाद ही साफ दिखाई देगी।

फिलहाल देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस भारत ने कभी दुनिया को चीनी की मिठास बांटी थी, वह आज अपनी ही रसोई की मिठास बचाने के लिए विदेशों का दरवाजा क्यों खटखटा रहा हैइस सवाल का जवाब सिर्फ खेत में नहीं, बल्कि गन्ने से एथेनॉल तक और निर्यात से घरेलू खाद्य सुरक्षा तक बनी पूरी नीति के संतुलन में छिपा है।

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