
पचपदरा रिफाइनरी हादसे पर नया शगूफा !, किसके हाथाें होगा उद्घाटन?
20 अप्रैल हादसे के बाद 4 महीने और लग सकते हैं सुधार में
15 साल में 3 सरकारें बदलीं, 2 बार शिलान्यास फिर भी अधूरा प्रोजेक्ट
79 हजार करोड़ से ज्यादा लागत, लेकिन काम में लगातार देरी
भारत की पहली ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड रिफाइनरी का दावा
ऊर्जा सुरक्षा और रोजगार के लिहाज से अहम परियोजना
विजय श्रीवास्तव,
जयपुर,dusrikhabar.com। पचपदरा में बन रही बहुप्रतीक्षित रिफाइनरी परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में हुए हादसे के बाद 21 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित उद्घाटन टल गया है, जिससे इस प्रोजेक्ट की देरी और विवाद फिर सुर्खियों में आ गए हैं।
पचपदरा में बन रही रिफाइनरी परियोजना एक बार फिर विवादों और देरी के चलते सुर्खियों में है। 20 अप्रैल 2026 को हुए हादसे के बाद 21 अप्रैल को प्रस्तावित उद्घाटन कार्यक्रम को फिलहाल टाल दिया गया है। इंजीनियरों के अनुसार, इस हादसे के बाद प्लांट को पूरी तरह सुरक्षित और ऑपरेशनल बनाने में कम से कम 4 महीने का समय लग सकता है।
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यह परियोजना पिछले 15 वर्षों से लगातार देरी का शिकार रही है। इस दौरान तीन सरकारें बदल चुकी हैं और दो बार शिलान्यास भी हो चुका है, लेकिन रिफाइनरी अब तक शुरू नहीं हो पाई है। इससे राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल उठने लगे हैं।

प्रोजेक्ट टाइमलाइन (इंफोग्राफिक के अनुसार)
- 2013: पहली बार शिलान्यास
- 2018: दोबारा शिलान्यास
- 2023: लागत बढ़कर ₹72,937 करोड़
- 2025-26: लागत ₹79,459 करोड़ के पार
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रिफाइनरी की खासियत
- क्षमता: 9 मिलियन टन प्रति वर्ष (MMTPA)
- पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स: 2.4 MMTPA
- निवेश: ₹79,450 करोड़ से अधिक
- नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स: 17.0
- डिजाइन: ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड रिफाइनरी + पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स
- उत्पादन: पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, पॉलीप्रोपाइलीन, ब्यूटाडीन आदि
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क्यों अहम है पचपदरा रिफाइनरी?
यह परियोजना न सिर्फ भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भी बढ़ाएगी। इसके साथ ही इस क्षेत्र में प्लास्टिक और पेट्रोकेमिकल पार्क विकसित करने की योजना है, जिससे हजारों रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
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विवाद और ‘शगूफा’ एंगल
रिफाइनरी की बार-बार टलती शुरुआत को लेकर अब सामाजिक और स्थानीय स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कुछ लोग इसे प्रशासनिक देरी मान रहे हैं, तो कुछ इसे “अशुभ मुहूर्त” जैसी मान्यताओं से जोड़ रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञ इसे पूरी तरह तकनीकी और सुरक्षा कारणों से जुड़ी देरी बता रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट में सुरक्षा सर्वोपरि होती है। हादसे के बाद बिना पूरी जांच और सुधार के संचालन शुरू करना जोखिम भरा हो सकता है। इसलिए देरी को सुरक्षा उपायों का हिस्सा माना जाना चाहिए।
अपडेट जारी है..
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