थैलेसीमिया मेजर और एंटी-एनएमडीए रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस के मरीजों को गीतांजलि हॉस्पिटल में मिला नया जीवन…

थैलेसीमिया मेजर और एंटी-एनएमडीए रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस के मरीजों को गीतांजलि हॉस्पिटल में मिला नया जीवन…

गीतांजलि मेडिकल कॉलेज उदयपुर की विशेषज्ञ टीम ने दिखाया चिकित्सा कौशल

थैलेसीमिया मरीज की जटिल स्प्लीन सर्जरी से एनएमडीए रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस तक उपचार

22 वर्षीय थैलेसीमिया मरीज की करीब 30 सेंटीमीटर बढ़ी स्प्लीन की जटिल सर्जरी सफल

मरीज 15–20 वर्षों से नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन पर निर्भर पीड़ित अब एकदम स्वस्थ

सर्जरी के बाद डेढ़-दो महीने में केवल एक यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ी

16 वर्षीय बालिका एंटी-NMDA रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस से थी पीड़ित

बोर्टेजोमिब थेरेपी के करीब दो सप्ताह बाद होश आया और दौरे हुए बंद 

छह माह के फॉलोअप में किशोरी सामान्य जीवन में लौटी

माही राठौड़

उदयपुर, dusrikhabar.com। गंभीर और लंबे समय से चली आ रही बीमारियां मरीज के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उम्मीद और चिंता के बीच का सफर बन जाती हैं। ऐसे ही दो चुनौतीपूर्ण मामलों में गीतांजलि हॉस्पिटल, उदयपुर की विशेषज्ञ चिकित्सकीय टीम ने जटिल उपचार के जरिए मरीजों को राहत की नई उम्मीद दी। एक मामले में लंबे समय से रक्त चढ़ाने पर निर्भर 22 वर्षीय थैलेसीमिया मरीज की बढ़ी हुई स्प्लीन की सफल सर्जरी की गई, जबकि दूसरे मामले में करीब एक महीने तक गंभीर स्थिति में रही

 22 वर्षीय थैलेसीमिया मरीज की जटिल स्प्लीन सर्जरी सफल

थैलेसीमिया मेजर से जूझ रहे 22 वर्षीय युवक के लिए नियमित रक्त चढ़ाना उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था। करीब 15–20 वर्षों से वह ब्लड ट्रांसफ्यूजन पर निर्भर था। हर सप्ताह उसे लगभग 1–2 यूनिट और महीने में करीब 7–8 यूनिट रक्त की जरूरत पड़ती थी। इसके साथ ही उसकी स्प्लीन करीब 30 सेंटीमीटर तक बढ़ चुकी थी, जिसके कारण हीमोग्लोबिन, WBC और प्लेटलेट्स भी कम रहते थे।

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सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैन और हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. नितिन चौधरी

सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैन और हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. नितिन चौधरी

कई अस्पतालों में परामर्श के बाद गीतांजलि हॉस्पिटल पहुंचा मरीज

मरीज ने जयपुर, उदयपुर, अहमदाबाद सहित राजस्थान और आसपास के कई बड़े चिकित्सा केंद्रों में उपचार के लिए सलाह ली। उसकी जटिल स्थिति और सर्जरी से जुड़े जोखिमों को देखते हुए कई जगह उसे ऑपरेशन के लिए उच्च स्तरीय केंद्र पर उपचार कराने की सलाह दी गई। इसके बाद मरीज गीतांजलि हॉस्पिटल में सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैन के पास पहुंचा। विस्तृत जांच और जोखिमों के मूल्यांकन के बाद सर्जरी का निर्णय लिया गया। उपचार की पूरी प्रक्रिया में हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. नितिन चौधरी और एनेस्थीसिया टीम की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

ऑपरेशन से पहले हीमोग्लोबिन करीब 3 ग्राम, 7 यूनिट ब्लड से तैयार किया गया

सर्जरी से पहले मरीज का हीमोग्लोबिन करीब 3 ग्राम था। ऑपरेशन के लिए उसे 7 यूनिट ब्लड चढ़ाकर तैयार किया गया। इसके बाद बढ़ी हुई स्प्लीन की जटिल सर्जरी की गई। खास बात यह रही कि ऑपरेशन के दौरान और ऑपरेशन के बाद मरीज को एक भी अतिरिक्त यूनिट ब्लड की जरूरत नहीं पड़ी। सर्जरी के बाद उसकी रिकवरी संतोषजनक रही और उसे चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया।

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सर्जरी के बाद ब्लड की जरूरत में बड़ी कमी

फॉलोअप में उपचार का सकारात्मक असर दिखाई दिया। डेढ़ से दो महीने के दौरान मरीज को केवल एक यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ी, जबकि सर्जरी से पहले उसे हर महीने करीब 7–8 यूनिट रक्त चढ़ाना पड़ता था। फॉलोअप के दौरान उसका हीमोग्लोबिन 7 ग्राम से ऊपर बना रहा। डॉ. हेमंत जैन के अनुसार, इस तरह के जटिल मामलों में प्री-ऑपरेटिव मूल्यांकन, बेहतर एनेस्थीसिया प्रबंधन और मल्टीडिसिप्लिनरी टीमवर्क बेहद महत्वपूर्ण होता है। डॉ. नितिन चौधरी के सहयोग से मरीज से जुड़े रक्त संबंधी जोखिमों और उपचार का समुचित प्रबंधन किया गया।

थेलेसीमिया में जटिल स्प्लीन सर्जरी

थेलेसीमिया में जटिल स्प्लीन सर्जरी

क्या होती है; थेलेसीमिया में जटिल स्प्लीन सर्जरी

थेलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर पर्याप्त या सामान्य हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। गंभीर मामलों में लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती हैं और लंबे समय तक रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। इस प्रक्रिया के दौरान तिल्ली (Spleen) बढ़ सकती है, जिसे स्प्लीनोमेगाली कहते हैं। बढ़ी हुई तिल्ली अधिक रक्त कोशिकाओं को नष्ट करने लगती है, जिससे एनीमिया और रक्त चढ़ाने की जरूरत बढ़ सकती है। कुछ मरीजों में हाइपरस्प्लेनिज्म के कारण प्लेटलेट और सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या भी कम हो सकती है। पेट के बाईं ओर दर्द या जल्दी पेट भरने की शिकायत हो सकती है।

ऐसी गंभीर स्थिति में, जब नियमित उपचार के बावजूद समस्या नियंत्रित न हो, विशेषज्ञ स्प्लीन सर्जरी यानी स्प्लेनेक्टॉमी (तिल्ली निकालने की सर्जरी) पर विचार कर सकते हैं। हालांकि यह अब हर थेलेसीमिया मरीज के लिए सामान्य उपचार नहीं है, क्योंकि सर्जरी के बाद गंभीर संक्रमण, रक्त के थक्के और पल्मोनरी हाइपरटेंशन का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए पहले रक्त चढ़ाने की उचित व्यवस्था और आयरन-चिलेशन उपचार जैसे विकल्पों का मूल्यांकन किया जाता है।

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एक महीने तक जिंदगी से जूझती 16 वर्षीय बालिका को मिला नया जीवन

वहीं एक अन्य दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बालिका को भी गीतांजलि में नया जीवन मिला। दरअसल गीतांजलि हॉस्पिटल में न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अनीस जुकरवाला के नेतृत्व में 16 वर्षीय बालिका का दुर्लभ और गंभीर एंटी-NMDA रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस का सफल उपचार किया गया। बालिका दुर्लभ एंटी-NMDA रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस से थी पीड़ित, बोर्टेजोमिब थेरेपी के बाद उसके स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार आया।

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न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अनीस जुकरवाला

न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अनीस जुकरवाला

करीब एक महीने तक मिर्गी के दौरे और बेहोशी की स्थिति

मरीज करीब एक महीने तक अनियंत्रित मिर्गी के दौरों, गंभीर असामान्य शारीरिक गतिविधियों और बेहोशी की स्थिति में रही। शुरुआती उपचार से अपेक्षित सुधार नहीं होने पर उसे गीतांजलि हॉस्पिटल में दोबारा जांच के लिए लाया गया। विस्तृत जांच के दौरान CSF परीक्षण के माध्यम से बीमारी की पुष्टि हुई, जिसके बाद चिकित्सकीय टीम ने उपचार की रणनीति में बदलाव किया।

रिटुक्सिमैब से अपेक्षित लाभ नहीं मिला तो शुरू की गई बोर्टेजोमिब थेरेपी

रिटुक्सिमैब और अन्य उपचारों से अपेक्षित लाभ नहीं मिलने के बाद चिकित्सकीय टीम ने बोर्टेजोमिब थेरेपी शुरू करने का निर्णय लिया। उपचार शुरू होने के करीब दो सप्ताह के भीतर मरीज को होश आने लगा, मिर्गी के दौरे बंद हो गए और असामान्य शारीरिक गतिविधियां भी समाप्त हो गईं। इसके बाद उसे वेंटिलेटर से हटाया गया और ट्रेकियोस्टॉमी भी बंद कर दी गई।

छह महीने बाद सामान्य जीवन में लौटी किशोरी

लगातार चिकित्सकीय निगरानी और फॉलोअप के बाद छह महीने की अवधि में मरीज की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। अब वह पूरी तरह स्वस्थ है और सामान्य जीवन में लौट चुकी है। डॉ. अनीस जुकरवाला ने बताया कि यह मामला सटीक निदान, लगातार चिकित्सकीय पुनर्मूल्यांकन और जटिल न्यूरोलॉजिकल बीमारियों में समय पर उन्नत उपचार के महत्व को सामने लाता है।

टी-NMDA रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस

टी-NMDA रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस

किस तरह की बीमारी है एंटी-NMDA रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस?

एंटी-NMDA रिसेप्टर एन्सेफलाइटिस एक दुर्लभ लेकिन गंभीर ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं पर मौजूद NMDA रिसेप्टर के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने लगती है। इससे मस्तिष्क के कामकाज में तेजी से बदलाव आने लगता है। बीमारी की शुरुआत कई बार बुखार, सिरदर्द या वायरल संक्रमण जैसे सामान्य लक्षणों से होती है। इसके बाद व्यवहार में अचानक बदलाव, भ्रम, चिड़चिड़ापन, मतिभ्रम, बोलने में परेशानी, याददाश्त कमजोर होना, दौरे, असामान्य हरकतें और बेहोशी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। कुछ मरीजों में सांस, रक्तचाप और हृदयगति जैसी स्वायत्त शारीरिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं।

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इसका निदान विशेषज्ञ न्यूरोलॉजिकल जांच, CSF में NMDA रिसेप्टर एंटीबॉडी, MRI/EEG और अन्य परीक्षणों से करते हैं। उपचार में स्टेरॉयड, IVIG या प्लाज्मा एक्सचेंज जैसी इम्यूनोथेरेपी दी जाती है। जरूरत पड़ने पर रिटक्सिमैब जैसी दूसरी लाइन की दवाएं और किसी संबंधित ट्यूमर का उपचार किया जाता है।

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