थैलेसीमिया से जंग में उम्मीद की किरण बन रहा Geetanjali Hospital उदयपुर

थैलेसीमिया से जंग में उम्मीद की किरण बन रहा Geetanjali Hospital उदयपुर

उदयपुर का गीतांजलि अस्पताल बना थैलेसीमिया मरीजों के लिए भरोसेमंद केंद्र

500 से अधिक मरीजों का इलाज, 1000 से ज्यादा लोगों की जेनेटिक काउंसलिंग

HPLC टेस्ट और प्री-नेटल जांच से रोकथाम पर विशेष फोकस

आधुनिक तकनीक और निःशुल्क उपचार सुविधाओं से मिल रही नई उम्मीद

विजय श्रीवास्तव,

उदयपुर,dusrikhabar.com। विश्व थैलेसीमिया दिवस पर जहां देशभर में इस गंभीर आनुवांशिक बीमारी को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं उदयपुर का Geetanjali Hospital & Medical College इलाज, रोकथाम और जागरूकता के क्षेत्र में एक मजबूत उदाहरण बनकर उभरा है। आधुनिक तकनीक, निःशुल्क उपचार, जेनेटिक काउंसलिंग और HPLC जांच जैसी सुविधाओं के जरिए अस्पताल अब तक सैकड़ों मरीजों को नई जिंदगी देने का कार्य कर चुका है।

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उदयपुर का गीतांजलि हॉस्पिटल बना थैलेसीमिया मरीजों के लिए भरोसेमंद केंद्र

राजस्थान में तेजी से बढ़ रहे थैलेसीमिया मामलों के बीच उदयपुर का गीतांजलि हॉस्पिटल एवं मेडिकल कॉलेज मरीजों के लिए राहत का बड़ा केंद्र बनकर सामने आया है। अस्पताल में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों और युवाओं को आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के साथ प्राथमिकता पर उपचार दिया जा रहा है।

भारत को दुनिया में “थैलेसीमिया कैपिटल” के रूप में देखा जाने लगा है। हर साल देश में लगभग 10 हजार बच्चे इस बीमारी के साथ जन्म लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह बीमारी मुख्य रूप से आनुवांशिक कारणों और जागरूकता की कमी के चलते तेजी से फैल रही है।

राजस्थान के इन जिलों में ज्यादा बढ़ रहा थैलेसीमिया का खतरा

राजस्थान के उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर और जयपुर जैसे क्षेत्रों में थैलेसीमिया मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। खासतौर पर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में यह बीमारी अधिक देखने को मिल रही है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण इलाकों में HPLC टेस्ट, स्क्रीनिंग और जेनेटिक काउंसलिंग की कमी के कारण लोग समय रहते बीमारी की पहचान नहीं करवा पाते। यही वजह है कि लाखों लोग अनजाने में इस बीमारी के कैरियर बने हुए हैं।

500 से अधिक मरीजों का इलाज, 1000 से ज्यादा लोगों की जेनेटिक काउंसलिंग

गीतांजलि हॉस्पिटल के क्लिनिकल हेमेटोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नितिन चौधरी के अनुसार अस्पताल में अब तक 1000 से अधिक लोगों की जेनेटिक काउंसलिंग की जा चुकी है, जबकि करीब 500 थैलेसीमिया रोगियों का सफल उपचार किया गया है।

अस्पताल लगातार जागरूकता अभियान भी चला रहा है ताकि लोग शादी से पहले जांच करवाकर इस बीमारी को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने से रोक सकें।

HPLC टेस्ट और प्री-नेटल जांच से रोकथाम पर विशेष फोकस

विशेषज्ञों के अनुसार थैलेसीमिया से बचाव संभव है, यदि समय रहते जांच करवा ली जाए। इसके लिए सबसे प्रभावी तरीका HPLC (High Performance Liquid Chromatography) टेस्ट माना जाता है।

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25% यदि शादी से पहले युवक और युवती दोनों थैलेसीमिया कैरियर पाए जाते हैं, तो उनके बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने की संभावना लगभग 25% तक बढ़ जाती है। गीतांजलि हॉस्पिटल में HPLC जांच, मॉलिक्यूलर डायग्नोसिस, जेनेटिक टेस्टिंग, एम्नियोसेंटेसिस और कोरियोनिक विलस सैम्पलिंग जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिनके जरिए गर्भावस्था के दौरान ही बीमारी की पहचान संभव हो रही है।

आधुनिक तकनीक और निःशुल्क उपचार से मरीजों को मिल रही नई उम्मीद

गीतांजलि हॉस्पिटल में थैलेसीमिया मरीजों को PRBC (Packed Red Blood Cells) ट्रांसफ्यूजन निःशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार मरीजों को रक्त के लिए डोनर की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि सरकार की ओर से रक्त उपलब्ध कराया जाता है।

इसके अलावा यहां मरीजों को आयरन चेलेशन थेरेपी, जेनेटिक काउंसलिंग और Luspatercept जैसी नई दवाएं नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और सपोर्टिव केयर जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

थैलेसीमिया से जंग में उम्मीद की किरण बन रहा Geetanjali Hospital उदयपुर

बोन मैरो ट्रांसप्लांट से संभव है स्थायी इलाज

विशेषज्ञों के अनुसार बोन मैरो ट्रांसप्लांट थैलेसीमिया का स्थायी इलाज माना जाता है। हालांकि इसकी लागत लगभग ₹15 लाख से ₹30 लाख तक होने के कारण अधिकांश परिवार इसे करवाने में सक्षम नहीं होते।

राजस्थान सरकार द्वारा थैलेसीमिया मरीजों को सहायता योजनाओं के तहत आर्थिक सहयोग और कई सरकारी अस्पतालों में फ्री बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सुविधा दी जा रही है। गीतांजलि हॉस्पिटल भी भविष्य में इस सुविधा को शुरू करने की दिशा में कार्य कर रहा है।

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बच्चों में ज्यादा मिल रहे थैलेसीमिया मेजर के मरीज

डॉ. नितिन चौधरी के अनुसार थैलेसीमिया मेजर के अधिकतर मरीज बच्चों की श्रेणी में आते हैं। इन मरीजों को हर 2 से 4 सप्ताह में ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता पड़ती है। वहीं थैलेसीमिया ट्रेट (माइनर) वाले लोगों में सामान्यतः कोई गंभीर लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन वे बीमारी के कैरियर होते हैं और भविष्य में अपने बच्चों को यह रोग दे सकते हैं।

जागरूकता ही थैलेसीमिया रोकने का सबसे बड़ा हथियार

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शादी से पहले HPLC जांच को अनिवार्य रूप से अपनाया जाए तो आने वाली पीढ़ियों को इस गंभीर बीमारी से बचाया जा सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग जागरूकता की कमी, सामाजिक झिझक और “हम पूरी तरह स्वस्थ हैं” जैसी मानसिकता के कारण जांच नहीं करवाते। यही कारण है कि रोकी जा सकने वाली बीमारी लगातार बढ़ रही है।

राजस्थान में थैलेसीमिया मरीजों की स्थिति चिंताजनक

एक अध्ययन के अनुसार भारत में करीब 13 लाख लोग थैलेसीमिया से पीड़ित हैं, जबकि लगभग 3 करोड़ 35 लाख लोग इसके कैरियर हैं।

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राजस्थान में अनुमानित 8000 से 12000 मरीज मौजूद हैं, जबकि पश्चिमी राजस्थान में लगभग 3–4% आबादी में थैलेसीमिया जीन पाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते स्क्रीनिंग और जागरूकता नहीं बढ़ाई गई तो आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ सकती है।

सरकारी सहायता से मरीजों को राहत

राजस्थान सरकार द्वारा थैलेसीमिया मरीजों को ₹1250 मासिक पेंशन, बोन मैरो ट्रांसप्लांट में सरकारी 10लाख रूपए तक की सहायता और  सरकारी अस्पतालों में उपचार में सहायता जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत मिल रही है।

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