प्रशांत किशोर की चाल, ममता से कैसे दूर हुआ बंगाल? भाजपा की रणनीति ने..

प्रशांत किशोर की चाल, ममता से कैसे दूर हुआ बंगाल? भाजपा की रणनीति ने..

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: भाजपा की ऐतिहासिक जीत के पीछे रणनीति

वोटर शिफ्ट और ‘राजस्थान मॉडल’ की बड़ी भूमिका

15 साल बाद बदला सत्ता समीकरण, टीएमसी का किला ध्वस्त

प्रवासी वोटर्स और ‘राजस्थान मॉडल’ ने बनाया मजबूत आधार

महिला वोट बैंक पर सीधी रणनीति, 3000 रुपये का वादा असरदार

SIR और सुरक्षा व्यवस्था से बदली मतदाता संरचना

प्रशांत किशोर की ममता से दूरी, क्या भाजपा की रणनीति?

विजय श्रीवास्तव,

जयपुर,dusrikhabar.com।पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज किया है। लगभग डेढ़ दशक से सत्ता में काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) को हटाकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पहली बार सत्ता हासिल की है। यह सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि रणनीति, संगठन, वोटर मैनेजमेंट और बड़े राजनीतिक नैरेटिव की निर्णायक सफलता मानी जा रही है।

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शायद आप ये जानते होंगे कि भाजपा पिछले 75 वर्षों में एक बार भी पूर्ण बहुमत से जीतकर बंगाल में सरकार बनाने में कामयाब नहीं रही। वहीं ये भी बड़ी सच्चाई है कि पिछले 15 वर्षों में ममता बनर्जी ने भाजपा को कभी जीत के आंकड़े के आसपास भी नहीं पहुंचने दिया। लेकिन इस बार भाजपा ने पूरी तैयारी और रणनीति के साथ बंगाल में ममता का चारों तरफ से घेराव किया और जनता की जरूरतों को समझ खुद को जनता का हितेषी साबित कर जनता का मूड बदलने में कामयाब रही। 

‘राजस्थान मॉडल’ और प्रवासी वोटर्स की अहम भूमिका

बंगाल चुनाव में राजेंद्र राठौड़ का सम्मान करते मंचासीन राजनेता भाजपा की जीत में सबसे चर्चित फैक्टर रहा ‘राजस्थान मॉडल’। कोलकाता और आसपास की सीटों पर बसे प्रवासी मारवाड़ी समुदाय को साधने के लिए पार्टी ने राजस्थान के अनुभवी नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी। 

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ जैसे दिग्गजों की टीम ने चुनावी प्रबंधन, बूथ स्तर की रणनीति और कार्यकर्ताओं को संगठित करने का काम संभाला।

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राज्य को पांच ज़ोन में बांटकर हर क्षेत्र में अलग रणनीति लागू की गई, जिससे भाजपा ने टीएमसी के ‘आउटसाइडर’ नैरेटिव का जवाब ‘प्रवासी एकता’ से दिया।

वहीं प्रवासी मारवाड़ियों के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल का चुनाव प्रचार में सक्रिय तौर पर मौजूद रहना भी भाजपा के लिए एक बड़ी सफलता साबित हुई।  

एंटी-इंकम्बेंसी और 15 साल का फैक्टर

2011 में जिस तरह ममता बनर्जी ने वामपंथी सरकार को हटाकर सत्ता हासिल की थी, लगभग वैसा ही परिदृश्य 2026 में देखने को मिला। 15 साल के शासन के बाद टीएमसी सरकार पर भ्रष्टाचार, हिंसा और महिलाओं से जुड़े मामलों को लेकर सवाल उठे। भाजपा ने इन मुद्दों को चुनावी अभियान का केंद्र बनाया और सरकार के पूरे कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखा। 92% से अधिक मतदान को भी बदलाव की इच्छा का संकेत माना गया, जिसने सत्ता परिवर्तन को मजबूत आधार दिया।

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महिला वोट बैंक और वेलफेयर पॉलिटिक्स का प्रभाव

इस चुनाव में महिला मतदाताओं को साधने की रणनीति निर्णायक साबित हुई। जहां टीएमसी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना पहले से मजबूत मानी जा रही थी, वहीं भाजपा ने इसे चुनौती देते हुए 3000 रुपये मासिक सहायता देने का वादा किया। यह आक्रामक वेलफेयर पॉलिटिक्स सीधे महिला वोट बैंक को प्रभावित करने में सफल रही और भाजपा के पक्ष में बड़ा झुकाव देखा गया।

SIR और मतदाता सूची में बड़ा बदलाव

चुनाव का एक अहम और विवादित पहलू रहा SIR (Special Intensive Revision)

  • लगभग 90 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए
  • कुल वोटर्स में करीब 12% बदलाव दर्ज हुआ
  • 60 लाख से अधिक नाम अनुपस्थित या मृत घोषित
  • 27 लाख मामले अभी विचाराधीन

टीएमसी ने इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ कदम बताया, जबकि भाजपा ने इसे फर्जी वोटर्स की सफाई करार दिया। इस प्रक्रिया से मतदाता संरचना में बड़ा बदलाव आया, जिसका असर चुनाव परिणामों में भी दिखा।

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भारी सुरक्षा व्यवस्था से बढ़ा मतदान

चुनाव आयोग ने इस बार रिकॉर्ड स्तर पर सुरक्षा बलों की तैनाती की।

  • 2407 कंपनियां (करीब 2.4 लाख जवान) तैनात
  • 2021 के मुकाबले तीन गुना अधिक सुरक्षा
  • हिंसा रहित और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित

इससे मतदाता बिना डर के वोट डाल सके और सिंडिकेट राज का प्रभाव कम हुआ।

सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी बनी फैक्टर

राज्य के सरकारी कर्मचारियों में लंबे समय से वेतन और भत्तों को लेकर असंतोष था। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में 7वें वेतन आयोग को लागू करने और 45 दिनों में बकाया भुगतान का वादा किया। इस रणनीति ने कर्मचारियों के वोट को प्रभावित किया और टीएमसी के पारंपरिक समर्थन में सेंध लगाई।

‘डबल इंजन’ बनाम ‘बंगाली अस्मिता’

चुनाव में दो बड़े नैरेटिव आमने-सामने रहे ममता बनर्जी का ‘बंगाली अस्मिता’ और  भाजपा का ‘डबल इंजन सरकार’। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व ने विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और केंद्र-राज्य तालमेल को मुद्दा बनाया। भाजपा ने यूपी और असम जैसे राज्यों के मॉडल का उदाहरण देते हुए विकास की नई तस्वीर पेश की।

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‘आउटसाइडर’ नैरेटिव को किया बेअसर

भाजपा ने खुद को ‘बाहरी पार्टी’ कहे जाने की धारणा को खत्म करने के लिए स्थानीय भाषाओं और क्षेत्रीय मुद्दों पर फोकस किया। भाजपा ने कुर्माली और राजबोंगशी भाषाओं को मान्यता देने का वादा और उत्तर बंगाल के लिए विशेष राजनीतिक समाधान की बात कही है। इससे पार्टी ने क्षेत्रीय पहचान की राजनीति में भी अपनी पकड़ मजबूत की।

‘महत्वाकांक्षी बंगाल’ का विजन और राष्ट्रीय असर

भाजपा ने अपने अभियान में 1 करोड़ रोजगार, औद्योगिक विकास और राज्य को लॉजिस्टिक हब बनाने का वादा किया। अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और हिमंता बिस्वा सरमा जैसे नेताओं ने इस विजन को जमीन पर उतारने का काम किया। इस जीत का असर सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि 2029 लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय राजनीति में भी इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

प्रशांत किशोर की ममता से दूरी, क्या भाजपा की रणनीति?

ममता की बड़ी हार के पीछे खुद उनका मैनेजमेंट, राजतंत्रशाही जैसा माहौल और कमजोर रणनीति बहुत बड़ा कारण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में ममता बनर्जी की बड़ी जीत के पीछे प्रशांत किशोर की रणनीति और उनकी टीम का हाथ रहा, वहीं ममता ने भी दिल खोल कर प्रशांत किशाेर की टीम पर पैसा खर्च किया था। हालांकि इस बार भी उन्होंने चुनाव प्रचार में पैसा पानी की तरह बहाया लेकिन उनकी रणनीति भाजपा के सामने कमजोर साबित हुई।

ममता बनर्जी, प्रशांत किशोर और थलपति विजय

सूत्रों की मानें तो प्रशांत किशोर जो खुद बिहार चुनाव में अपनी “जन सुराज पार्टी” को एक भी सीट नहीं जिता पाए, लेकिन उन्होंने तमिलनाडु में थलपति विजय की पार्टी TVK जो पहली बार मैदान में उतरी और बड़े बड़े दिग्गजों की पार्टियों को धूल चटाते हुए बहुमत हासिल करने में कामयाब हुई।

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राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि बंगाल में ममता से दूरी बनाने के लिए भी प्रशांत किशोर भाजपा की रणनीति का ही एक हिस्सा हैं। क्योंकि जब पीके ने पिछले विधानसभा चुनावोंं में चुनावी रणनीतिकार की जगह खुद को एक राजनेता को रूप में प्रस्तुत किया और किसी भी पार्टी के लिए रणनीति बनाने से मना किया था तो फिर इस बार तमिलनाडु में टीवीके के लिए रणनीतिकार क्यों बनें? क्यों उन्होंने बंगाल चुनावों में ममता बनर्जी से दूरी बनाई। जबकि प्रशांत किशोर और ममता बनर्जी के आपसी रिश्तों में कोई खटास नहीं है। 

बहरहाल बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का परिणाम एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है। रणनीति, संगठन, वोटर मैनेजमेंट और मजबूत नैरेटिव के दम पर भाजपा ने पहली बार राज्य की सत्ता हासिल की है। यह जीत आने वाले समय में न सिर्फ राज्य बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में भी अहम भूमिका निभा सकती है।

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