वैश्विक संकट के बीच भारतीय कृषि: अब खेती से आगे सोचने का समय…!

वैश्विक संकट के बीच भारतीय कृषि: अब खेती से आगे सोचने का समय…!

पश्चिम एशिया तनाव से उर्वरक और ऊर्जा आपूर्ति पर असर

लागत बढ़ने से किसानों की आय पर दबाव

प्रोसेसिंग और बाजार एकीकरण बनेगा भविष्य का आधार

भारत-ईयू समझौता कृषि के लिए नया अवसर

छोटे किसानों को जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती

विजय श्रीवास्तव,

Dusrikhabar.com। दुनिया में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता, खासकर पश्चिम एशिया में तनाव, ने भारतीय कृषि की कमजोर कड़ियों को फिर उजागर कर दिया है। उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव, ऊर्जा लागत में वृद्धि और लॉजिस्टिक्स में बाधाओं का सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ रहा है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल इन तात्कालिक संकटों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह है कि भारत की कृषि प्रणाली को लंबे समय तक स्थिर और मजबूत कैसे बनाया जाए।

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दरअसल, अब समय आ गया है कि कृषि विकास को सिर्फ खेत तक सीमित न रखकर “फार्म गेट” से आगे बढ़ाया जाए। इसमें प्रोसेसिंग, स्टोरेज, सप्लाई चेन और बाजार तक पहुंच जैसे क्षेत्रों में निवेश जरूरी हो गया है। यदि इन क्षेत्रों को मजबूत किया जाता है, तो न केवल किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे बल्कि भारत वैश्विक एग्री-वैल्यू चेन में भी अपनी मजबूत स्थिति बना सकेगा।

वैश्विक बाजार और भारतीय कृषि का रिश्ता

आज भारत की कृषि अर्थव्यवस्था करीब 600 अरब डॉलर की है, और अनुमान है कि यह अगले दशक में 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि भारत केवल कच्चा उत्पाद बेचने के बजाय वैल्यू एडेड कृषि उत्पादों पर ध्यान दे।

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भारत-यूरोपीय संघ (EU) समझौता इसी दिशा में एक बड़ा अवसर माना जा रहा है। हालांकि इसमें टैरिफ में सीमित राहत है, लेकिन यह समझौता स्पष्ट करता है कि भविष्य में कृषि व्यापार केवल कीमत पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता, सुरक्षा और मानकों पर आधारित होगा।

यूरोपीय बाजार में प्रवेश के लिए फूड सेफ्टी, पैकेजिंग, रेसिड्यू लिमिट और सस्टेनेबिलिटी जैसे मानकों का पालन अनिवार्य है। यही कारण है कि अब भारतीय किसानों और एग्री-बिजनेस को इन पहलुओं पर ध्यान देना होगा।

खेती से उद्योग तक: बदलती तस्वीर

भारत में पहले से ही कुछ सेक्टर इस बदलाव का उदाहरण पेश कर रहे हैं। चाय, कॉफी, मसाले, प्रोसेस्ड फूड और समुद्री उत्पादों में वे निर्यातक सफल हुए हैं जिन्होंने गुणवत्ता, ब्रांडिंग और अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाया है। यह मॉडल साफ संकेत देता है कि अगर किसान और कंपनियां मिलकर काम करें, तो खेती-किसानी को एक लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है।

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छोटे किसानों के सामने चुनौती

हालांकि इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी है। अगर यह विकास केवल बड़े एग्री-बिजनेस तक सीमित रहा, तो छोटे किसान पीछे छूट सकते हैं। आज भी देश में छोटे किसान सीमित संसाधनों से जूझ रहे हैं, एफपीओ (FPOs) पूरी तरह मजबूत नहीं हैं, कोल्ड स्टोरेज और टेस्टिंग सुविधाएं सीमित हैं और लॉजिस्टिक्स बिखरा हुआ है, ऐसे में कृषि विकास में असमानता बढ़ने का खतरा बना हुआ है।

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समाधान: नीति और निवेश की भूमिका

विशेषज्ञों के अनुसार, इस चुनौती से निपटने के लिए तीन क्षेत्रों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है:

पहला, इन्फ्रास्ट्रक्चर—प्रयोगशालाएं, कोल्ड स्टोरेज और सप्लाई चेन को मजबूत करना।
दूसरा, नीति स्थिरता—निर्यात पर अचानक प्रतिबंध लगाने से बचना, ताकि बाजार में भरोसा बना रहे।
तीसरा, संस्थागत क्षमता—एफपीओ और किसान समूहों को मजबूत करना, ताकि वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। 

जहां इन क्षेत्रों में सुधार हुआ है, वहां कृषि निर्यात में स्थिरता और वृद्धि दोनों देखी गई है।

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कृषि को उत्पादन तक सीमित रखने की जगह वैल्यू चेन पर ध्यान की जरूरत 

आज की स्थिति में भारतीय कृषि एक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर वैश्विक संकट और अस्थिरता है, तो दूसरी ओर नए बाजार और अवसर भी मौजूद हैं। नीतिनिर्माताओं के लिए यह समय है कि वे कृषि को केवल उत्पादन तक सीमित न रखें, बल्कि पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने पर ध्यान दें। वहीं, किसानों और एग्री-बिजनेस को भी प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और ट्रेसबिलिटी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना होगा।

बहरहाल यह कहना गलत नहीं होगा कि सफलता उसी मॉडल में है जिसमें छोटे किसान भी इस विकास यात्रा के हिस्सेदार बनें

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