
गणेश चतुर्थी: घर-घर विराजेंगे बप्पा, जानिए क्यों मनाते हैं यह पर्व और कैसे बना आस्था से उत्सव तक का सफर?
गणेश चतुर्थी का महाआयोजन 14 सितंबर को, पैदल यात्रा कर मोती डूंगरी में उमड़े श्रद्धालु
गणपति के स्वागत से लेकर विसर्जन तक 10 दिन चलेगा भक्ति का दौर
महाराष्ट्र से लेकर राजस्थान तक अलग-अलग रंगों में मनाया जाता है गणेशोत्सव
25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर होगा मुख्य गणेश विसर्जन
भगवान गणेश को पूजा जाता है विघ्नहर्ता, बुद्धि और शुभारंभ के देवता के रूप में
सार्वजनिक गणेशोत्सव के आधुनिक स्वरूप में लोकमान्य तिलक और 1893 महत्वपूर्ण
महाराष्ट्र, खासकर मुंबई और पुणे, सार्वजनिक गणेशोत्सव के सबसे बड़े केंद्रों में
मुंबई का लालबागचा राजा देश के सबसे प्रसिद्ध गणपति आयोजनों में शुमार
राजस्थान में जयपुर का मोती डूंगरी गणेश मंदिर, गणेश चतुर्थी पर प्रमुख आस्था केंद्र
विजय श्रीवास्तव/माही राठौड़/सोनिया/महावीर
जयपुर,dusrikhabar.com। गणेश चतुर्थी केवल भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करने और पूजा करने का पर्व नहीं है। यह नई शुरुआत, परिवार की खुशहाली, बुद्धि, विवेक और विघ्नों से मुक्ति की कामना से जुड़ा ऐसा उत्सव है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ परिवार और समाज भी एक साथ आता है। घर में मिट्टी के गणेश को लाने से लेकर आरती, मोदक के भोग, बच्चों की खुशी और अंत में भावुक विदाई तक—यह पर्व अपने भीतर आस्था के साथ अपनापन और रिश्तों की गर्माहट भी समेटे रहता है।
कल यानी सोमवार 14 सितंबर, देशभर में गणेश चतुर्थी मनाई जाएगी। चतुर्थी तिथि 14 सितंबर सुबह 7:06 बजे से 15 सितंबर सुबह 7:44 बजे तक रहेगी। सामान्य तौर पर 10 दिवसीय गणेशोत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी पर होता है, जो इस वर्ष 25 सितंबर को है।
गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और विवेक के देवता तथा शुभ कार्यों के आरंभकर्ता के रूप में पूजा जाता है। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में किसी नए काम, गृहप्रवेश, विवाह, व्यापार या अन्य शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण करने की परंपरा है। गणेश चतुर्थी इसी भावना को सामूहिक उत्सव का रूप देती है।
बप्पा से लोग सिर्फ समृद्धि नहीं मांगते
किसी के लिए गणपति बीमार परिवारजन के ठीक होने की प्रार्थना हैं, किसी के लिए बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की चिंता का सहारा, तो किसी के लिए नए कारोबार की शुरुआत का भरोसा। यही वजह है कि गणेशोत्सव में भगवान के सामने रखी जाने वाली सबसे बड़ी प्रार्थना अक्सर धन नहीं, बल्कि “घर में सुख-शांति बनी रहे” होती है।

गणेश चतुर्थी कब से मनाई जा रही है?
गणेश पूजा की परंपरा प्राचीन भारत से चली आ रही है, लेकिन आज जिस रूप में बड़े सार्वजनिक गणेशोत्सव दिखाई देते हैं, उनका आधुनिक स्वरूप विशेष रूप से महाराष्ट्र से जुड़ा है।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेश उत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य धार्मिक आयोजन के साथ लोगों को एक मंच पर लाना और सामाजिक एकता की भावना मजबूत करना भी था। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग भी 1893 को सार्वजनिक गणेशोत्सव के इस आधुनिक विस्तार से जोड़ता है।
इससे गणेश पूजा घरों तक सीमित न रहकर सार्वजनिक मंडप, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामूहिक आरती और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ती चली गई।
गणेश जी के जन्म की पौराणिक कथा का अपना महत्व
गणेश जी के जन्म को लेकर सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसे अपना द्वारपाल बना दिया। जब भगवान शिव वहां पहुंचे तो उस बालक ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इससे विवाद बढ़ा और भगवान शिव ने क्रोध में उसका सिर काट दिया।
माता पार्वती को जब यह पता चला तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं। तब भगवान शिव ने बालक को पुनर्जीवन देने का वचन दिया। इसके बाद हाथी का सिर लगाकर उस बालक को पुनर्जीवित किया गया और वही गणेश कहलाए। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद दिया। इसी वजह से आज भी किसी शुभ काम से पहले “श्री गणेश” करने की परंपरा है।
एक अन्य प्रसिद्ध कथा में गणेश जी की बुद्धिमत्ता का वर्णन मिलता है। जब उन्हें और कार्तिकेय को संसार की परिक्रमा करने की चुनौती मिली तो कार्तिकेय अपने वाहन पर निकल पड़े, जबकि गणेश जी ने अपने माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा करते हुए कहा कि माता-पिता ही उनके लिए पूरा संसार हैं। इस कथा को गणेश जी की बुद्धि और विवेक से जोड़कर देखा जाता है।
ऐसे मनाएं गणेश चतुर्थी
गणेशोत्सव की शुरुआत गणेश प्रतिमा की स्थापना से होती है। घर में पूजा के लिए साफ-सफाई कर एक स्थान पर चौकी या पूजा स्थल तैयार किया जाता है। प्रतिमा स्थापित करने के बाद भगवान गणेश का पूजन, आरती और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
पूजा में सामान्य तौर पर ये चीजें होती हैं शामिल
दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, अक्षत, चंदन, फल, नारियल, गुड़ और मोदक आदि अर्पित करने की परंपरा है। मोदक को गणेश जी का प्रिय भोग माना जाता है। इसके बाद परिवार के सदस्य मिलकर गणेश आरती करते हैं। कई घरों में प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा होती है और बच्चे भी उत्साह से इसमें भाग लेते हैं। प्रतिमा को परिवार की परंपरा के अनुसार डेढ़, तीन, पांच, सात या दस दिन रखा जा सकता है। अंत में विसर्जन किया जाता है।

इस बार पर्यावरण का भी रखें ध्यान
गणेशोत्सव की सबसे खूबसूरत परंपरा को प्रकृति के साथ जोड़ना भी जरूरी है। इसलिए शुद्ध मिट्टी की छोटी प्रतिमा, प्राकृतिक रंग, कम सजावटी प्लास्टिक और घर में या निर्धारित कृत्रिम जलाशय में विसर्जन जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग भी पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव में मिट्टी की प्रतिमाओं और प्राकृतिक रंगों को प्रोत्साहित करता है।
भारत में सबसे भव्य गणेशोत्सव
अगर सार्वजनिक और सामूहिक उत्सव की भव्यता की बात करें तो महाराष्ट्र का गणेशोत्सव देश में सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध आयोजनों में शामिल है। खास तौर पर मुंबई और पुणे में गणेशोत्सव का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्वरूप बेहद व्यापक है।
मुंबई में बप्पा बनते हैं पूरे शहर के मेहमान
मुंबई का गणेशोत्सव केवल मंदिर या पंडाल तक सीमित नहीं रहता। यहां बड़े-बड़े सार्वजनिक मंडपों में आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित होती हैं और लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लालबागचा राजा इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। श्रद्धालु लंबी कतारों में खड़े होकर बप्पा के दर्शन करते हैं और अपनी मनोकामनाओं के साथ लौटते हैं। 2026 में भी लालबागचा राजा को लेकर देश-विदेश के भक्तों में खास उत्साह है।
मुंबई के गणेशोत्सव की एक खास बात यह भी है कि अब कई मंडल सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश को भी उत्सव का हिस्सा बना रहे हैं। 2026 में लालबागचा राजा मंडल के प्रसाद से निकलने वाले जैविक कचरे से बिजली बनाने की पहल भी सामने आई है, जिससे अस्पतालों को ऊर्जा उपलब्ध कराने की योजना है। यानी बप्पा का उत्सव अब केवल पूजा नहीं, समाज सेवा का माध्यम भी बन रहा है।

राजस्थान में कहां-कहां होती है विशेष गणेश पूजा?
राजस्थान में गणेश चतुर्थी का सबसे प्रमुख और व्यापक धार्मिक केंद्र जयपुर का मोती डूंगरी गणेश मंदिर है। राजस्थान पर्यटन के अनुसार यह जयपुर के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है और गणेश चतुर्थी पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
इसके अलावा जयपुर में गण-गणेश और नहर के गणेश मंदिर में बड़े आयोजन होते हैं। इसी प्रकार सवाई माधोपुर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर और कोटा के खड़े गणेशजी मंदिर में भी इस दिन विशेष आयोजन रखे जाते हैं।
जयपुर में मोती डूंगरी पर दिखता है अलग ही उत्साह
Moti Dungri Ganesh Ji Temple पर गणेश चतुर्थी के दौरान विशेष पूजा-अर्चना, सजावट और दर्शन व्यवस्था की जाती है। 2026 में यहां 7 से 15 सितंबर तक नौ दिवसीय गणेशोत्सव के कार्यक्रम रखे गए हैं। गणेश जन्मोत्सव 14 सितंबर को और अगले दिन नगर भ्रमण का कार्यक्रम बताया गया है। इस बार यहां विशेष झांकियां, धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम और भक्ति संगीत भी आकर्षण का हिस्सा हैं।
मोती डूंगरी से जुड़ी एक दिलचस्प मान्यता मेहंदी प्रसाद की भी है। लगभग 200 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में गणेश चतुर्थी पर विशेष मेहंदी प्रसाद दिया जाता है, जिसे लेकर विवाह की मनोकामना से जुड़ी आस्था है।
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जयपुर के दूसरे गणेश मंदिर भी बनते हैं आस्था के केंद्र
गणेश चतुर्थी के दौरान जयपुर में गढ़ गणेश, नाहर के गणेश और ध्वजाधीश गणेश सहित कई मंदिरों में भी विशेष पूजा-अर्चना होती है। शहर की गणेश परंपरा केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग मोहल्लों और मंदिरों में स्थानीय स्तर पर गणपति स्थापना और धार्मिक कार्यक्रम होते हैं।
राजस्थान के दूसरे शहरों और कस्बों में भी स्थानीय गणेश मंदिरों, बाजारों और कॉलोनियों में प्रतिमाएं स्थापित कर सामूहिक आरती, भजन और प्रसाद वितरण किया जाता है। यानी राजस्थान में गणेशोत्सव का स्वरूप महाराष्ट्र जितना विशाल सार्वजनिक न सही, लेकिन स्थानीय आस्था और पारिवारिक भागीदारी के कारण इसका अपना अलग रंग है।
गणेशोत्सव की सबसे खूबसूरत बात—विदाई में छिपा मिलन का संदेश
गणेश चतुर्थी की शुरुआत जिस उत्साह से होती है, विसर्जन का क्षण अक्सर उतना ही भावुक होता है। कुछ दिनों तक घर के सदस्य बप्पा को परिवार के सदस्य की तरह रखते हैं और फिर ढोल-नगाड़ों के बीच उन्हें विदा करते हुए कहते हैं—
“गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।”
यही इस पर्व का सबसे मानवीय संदेश है—ईश्वर को घर बुलाना, उनके साथ खुशियां बांटना और फिर विश्वास के साथ उन्हें विदा करना कि वे अगले वर्ष फिर लौटेंगे। गणेशोत्सव इसलिए सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि परिवार, पड़ोस, समाज और संस्कृति को जोड़ने वाला उत्सव है।
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