
सरस डेयरी की ‘मायरा योजना’ बनी बेटियों का सहारा, 968 किसान परिवारों की शादी में सरस ने भरा भात…
21 हजार रुपये के चेक से आगे बढ़कर अपनापन: भात लेकर परिवारों तक पहुंच रहे सरस के अधिकारी
सहकारिता से रिश्तों तक: गांवों में भरोसा और सामाजिक जुड़ाव मजबूत कर रही मायरा योजना
मायरे की राशि का चैक ले जाने वाले अधिकारियों का होता है भाई की तरह सत्कार
अफसर मिलकर मायरे के चैक के साथ बिटिया,बहन और परिवार दे रहे कपड़े और उपहार
विजय श्रीवास्तव,
जयपुर,dusrikhabar.com। राजस्थान की मिट्टी में रिश्तों, परंपराओं और सामाजिक सहयोग की खुशबू हमेशा से रही है। यहां बेटी की शादी केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का उत्सव मानी जाती है। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए सरस डेयरी जयपुर ने एक ऐसी पहल शुरू की है, जिसने सैकड़ों किसान परिवारों के चेहरों पर मुस्कान ला दी है।
अप्रैल 2025 में शुरू हुई ‘मायरा योजना’ के तहत अब तक 968 दुग्ध उत्पादक किसान परिवारों की बेटियों की शादी में सरस डेयरी ने ‘भात’ भरकर आर्थिक और सामाजिक सहयोग दिया है।
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बेटी की शादी में सरस डेयरी बनी परिवार का हिस्सा
राजस्थान में बेटी की शादी के समय ‘मायरा’ या ‘भात’ की परंपरा बेहद खास मानी जाती है। यह सिर्फ रस्म नहीं बल्कि रिश्तों की मिठास, अपनापन और सहयोग का प्रतीक होती है।
सरस डेयरी जयपुर ने इसी परंपरा को आधुनिक सामाजिक सहयोग से जोड़ते हुए अपने सदस्य किसानों के परिवारों के लिए मायरा योजना शुरू की। योजना के तहत डेयरी की ओर से बेटी की शादी पर 21 हजार रुपए का चेक दिया जाता है।
लेकिन यह सहयोग केवल चेक तक सीमित नहीं रहता। कई बार डेयरी से जुड़े सदस्य खुद परिवार के साथ मायरा भरने पहुंचते हैं। कोई मिठाई लेकर जाता है, कोई कपड़े, तो कोई बर्तन और घरेलू सामान। माहौल बिल्कुल वैसा बन जाता है जैसे किसी अपने घर की बेटी की शादी हो।
15 महीनों में 968 परिवारों तक पहुंचा सहयोग
पिछले करीब 15 महीनों में सरस डेयरी जयपुर ने 968 किसान परिवारों की बेटियों की शादी में सहयोग स्वरूप 21000 रुपए का चैक भेंट किया है। ग्रामीण इलाकों में जहां शादी का खर्च कई परिवारों के लिए बड़ी चिंता बन जाता है, वहां यह योजना आर्थिक संबल के साथ भावनात्मक सहारा भी बन रही है। कई परिवारों का कहना है कि उन्हें पहली बार लगा कि कोई संस्था सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि रिश्तों को भी समझती है।
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राजस्थान में कैसे भरा जाता है ‘मायरा’ या ‘भात’
राजस्थान में मायरा (भात) बेटी के विवाह का सबसे भावनात्मक और सम्मानजनक संस्कार माना जाता है। यह आमतौर पर मामा और ननिहाल पक्ष की ओर से भरा जाता है, जिससे यह संदेश दिया जाता है कि बेटी शादी के बाद भी मायके के लिए उतनी ही प्रिय है।
मायरा भरने की परंपरा में कपड़े, मिठाई, नकद राशि, गहने, बर्तन और घरेलू उपयोग का सामान भेंट किया जाता है। कई जगह मामा विशेष जुलूस या पारंपरिक रीति से विवाह स्थल पर पहुंचता है और दूल्हा-दुल्हन सहित पूरे परिवार को उपहार देता है।

मायरा में भात का सामान
मायरा की खास बातें
- मामा का विशेष सम्मान — मायरा लाने वाले का स्वागत भाई की तरह किया जाता है।
- उपहारों का प्रतीकात्मक महत्व — आर्थिक सहयोग के साथ अपनापन और जिम्मेदारी का संदेश।
- बेटी के मान-सम्मान की परंपरा — पूरा ननिहाल बेटी के साथ खड़ा होने का भरोसा देता है।
- सामाजिक जुड़ाव — यह रस्म रिश्तों को मजबूत करने और परिवारों को जोड़ने का माध्यम मानी जाती है।
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आज भी ग्रामीण और शहरी राजस्थान में मायरा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि स्नेह, सम्मान और सामाजिक सहयोग की जीवंत परंपरा के रूप में निभाया जाता है।

किसान परिवार की बेटी की शादी में भात भरने पहुंचे जयपुर सरस डेयरी एमडी मनीष फौजदार
सरस परिवार केवल दूध का नहीं, रिश्तों का भी है: मनीष फौजदार
सरस डेयरी जयपुर के प्रबंध निदेशक मनीष फौजदार का मानना है कि सहकारिता केवल कारोबार का माध्यम नहीं, बल्कि लोगों को दिल से जोड़ने वाली भावना भी है। यही सोच ‘मायरा योजना’ की प्रेरणा बनी। वे कहते हैं कि इस योजना का उद्देश्य सिर्फ किसान परिवारों को आर्थिक सहायता देना नहीं है, बल्कि सरस डेयरी से जुड़े हर सदस्य को यह एहसास कराना है कि वह एक बड़े परिवार का हिस्सा है।
सरस डेयरी एमडी फौजदार के अनुसार, “हम चाहते हैं कि सरस से जुड़े किसान, महिलाएं और उनके परिवार सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहें। आर्थिक सहयोग तो इसका एक हिस्सा है, लेकिन असली मकसद रिश्तों को मजबूत बनाना और अपनत्व की भावना को जीवित रखना है।”
फौजदार भावुक होकर बोले- जब वे स्वयं कई किसान परिवारों की बेटियों की शादी में मायरा (भात) लेकर पहुंचे, तो वहां मिले सम्मान और स्नेह ने उन्हें गहराई से छू लिया। “परिवारों ने हमारा जिस आत्मीयता और अपनेपन से स्वागत किया, उससे ऐसा लगा मानो मैं किसी किसान के घर नहीं, बल्कि अपनी ही बहन के घर भात लेकर पहुंचा हूं। उस पल सरस और किसान के बीच का रिश्ता किसी संस्था और सदस्य का नहीं, बल्कि परिवार का लग रहा था।”
मनीष फौजदार का मानना है कि भले ही सरस डेयरी की ओर से 21 हजार रुपये का चेक भेंट किया जाता है, लेकिन इस सहायता का मूल्य केवल राशि से नहीं आंका जा सकता। “इस चेक के पीछे हमारी भावना यह है कि सरस परिवार से जुड़ा कोई भी सदस्य खुद को अकेला महसूस न करे। जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों पर हम उनके साथ खड़े रहें, उनके मान-सम्मान के सहभागी बनें और हर परिस्थिति में उन्हें संबल दे सकें। यही मायरा योजना की असली आत्मा है।”
उनके अनुसार, सहकारी संस्थाओं की सफलता केवल आर्थिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि समाज और परिवारों के साथ बनाए गए भावनात्मक रिश्तों से भी तय होती है। ‘मायरा योजना’ इसी मानवीय सोच और सामाजिक जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण बनकर उभरी है।
किसानों के हर मंच पर होती है जयपुर डेयरी की मायरा योजना की तारीफ
जयपुर सरस डेयरी की इस अनोखी योजना की मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, पशुपालन मंत्री जोराराम कुमावत और राजस्थान कॉपरेटिव डेयरी फेडरेशन की प्रबंध संचालक, वरिष्ठ आईएएस श्रुति भारद्वाज भी विभिन्न मंचों पर प्रशंसा कर चुके हैं। इस योजना को लेकर जयपुर सरस डेयरी के चेयरमैन ओम पूनिया ने भी कई मौकों पर मायरा योजना, इसके संचालक और सोच के जनक मनीष फौजदार का भी खूब सराहा है।
गांवों में बढ़ रहा अपनापन और भरोसा
मायरा योजना का असर अब जयपुर जिले के गांवों में साफ दिखाई देने लगा है। दुग्ध किसान परिवारों में डेयरी के प्रति अपनापन बढ़ा है और महिलाओं की भागीदारी भी मजबूत हुई है।
ग्रामीण समाज में लोग इस पहल को केवल योजना नहीं बल्कि “सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने वाला अभियान” मान रहे हैं। कई सामाजिक संगठनों ने भी इस मॉडल को अन्य सहकारी संस्थाओं के लिए प्रेरणा बताया है।
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