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नेपाल की बाढ़ से बिहार के 8 जिलों में हाई अलर्ट, 300 भारतीय, 500 तिब्बती लोग लापता, 175 की मौत, हिमालय की पिघलती बर्फ ला सकती आफत…!

नेपाल की बाढ़ से बिहार के 8 जिलों में हाई अलर्ट, 300 भारतीय, 500 तिब्बती लोग लापता, 175 की मौत, हिमालय की पिघलती बर्फ ला सकती आफत…!

भारत में 88 ग्लेशियर झीलों पर मंडरा रहा GLOF का खतरा

भारत के 6 राज्यों पर नजर प्रशासन की नजर

हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर झीलों की संख्या 1990 के 107 से बढ़कर 2024 में 669 हुई

88 झीलें GLOF के लिहाज से संभावित खतरे वाली श्रेणी में 

9 झीलें बेहद ज्यादा खतरनाक श्रेणी में 

हिमसू झील टूटने पर करीब 14 लाख लीटर पानी प्रति सेकेंड बहने का अनुमान

सतलुज बेसिन संबंधित झील से करीब 35 लाख लीटर पानी प्रति सेकेंड आने का अनुमान

ग्लोबल वार्मिंग, हिमस्खलन-भूस्खलन और अत्यधिक बारिश GLOF के प्रमुख कारण

नेपाल का पानी सुनकोशी-सप्तकोशी-कोसी नदी तंत्र के जरिए पहुंच सकता बिहार 

नवीन सक्सेना,

जयपुर/दिल्ली/पटना, dusrikhabar.com। हिमालय की ऊंची चोटियों पर जमा बर्फ और ग्लेशियर सिर्फ नदियों के लिए पानी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि अब इनके तेजी से बदलते स्वरूप ने नई चिंता पैदा कर दी है। नेपाल में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने ग्लेशियर झीलों के फटने यानी Glacier Lake Outburst Flood (GLOF) के खतरे को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया है। कुछ ही मिनटों में नदी का जलस्तर बढ़ना, पुलों और सड़कों का बह जाना तथा बस्तियों में तबाही मच जाना इस प्राकृतिक खतरे की भयावहता को दिखाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत भी इस खतरे से अछूता नहीं है। हिमाचल प्रदेश में पिछले तीन दशकों में ग्लेशियर झीलों की संख्या कई गुना बढ़ी है। एक अध्ययन के मुताबिक यहां मौजूद 669 ग्लेशियर झीलों में से 88 को संभावित रूप से खतरनाक माना गया है। इसका असर केवल पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि नदियों के रास्ते मैदानी इलाकों तक भी पहुंच सकता है।

नेपाल की बाढ़ से हिमालयी खतरे की बढ़ी चिंता

26 अगस्त की सुबह करीब 9 बजे नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी अचानक उफान पर आ गई। देखते ही देखते तेज बहाव ने सड़क, पुल, इमारतों और आसपास के इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया।

शुरुआती आकलन में इस आपदा के पीछे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF की आशंका जताई गई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में लोगों की मौत और लापता होने की खबरों ने पूरे क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है।

यह पहली घटना नहीं है। जुलाई 2025 में भी इसी हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झील टूटने से अचानक बाढ़ आई थी, जिसमें कई लोगों की जान गई थी। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं यह सवाल खड़ा कर रही हैं कि बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के बीच हिमालयी झीलें कितनी सुरक्षित हैं?

भारत में तेजी से बढ़ रही हैं ग्लेशियर झीलें

IIT रोपड़ और University of Technology Sydney की संयुक्त रिसर्च ने हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर झीलों को लेकर महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखी है।

अध्ययन के मुताबिक:

  • 1990 में हिमाचल प्रदेश में 107 ग्लेशियर झीलें दर्ज की गई थीं।
  • 2024 तक इनकी संख्या बढ़कर 669 हो गई।
  • यानी करीब तीन दशकों में झीलों की संख्या में 525 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  • इनमें से 88 झीलों को GLOF के लिहाज से जोखिम वाला माना गया है।
  • 9 झीलें बेहद ज्यादा खतरनाक, 18 ज्यादा खतरनाक और 26 मध्यम खतरे वाली श्रेणी में रखी गई हैं।

यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है। इसके पीछे हिमालयी इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों, बांधों, सड़कों, पुलों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरक्षा जुड़ी हुई है।

एक झील टूटी तो हर सेकेंड लाखों लीटर पानी का सैलाब

रिसर्च में ब्यास बेसिन की हिमसू झील और सतलुज बेसिन की एक बेनाम झील को लेकर मॉडलिंग की गई।

अगर हिमसू झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो अनुमान के मुताबिक 1,385 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड पानी नीचे की ओर पहुंच सकता है। आसान भाषा में कहें तो यह करीब 14 लाख लीटर पानी हर सेकेंड के बराबर है।

वहीं सतलुज बेसिन की झील में प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में 3,507 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड तक पानी का प्रवाह होने का अनुमान लगाया गया है। यानी करीब 35 लाख लीटर पानी हर सेकेंड

ऐसे हालात में डैम, हाइड्रोपावर परियोजनाओं और सैकड़ों इमारतों पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

आखिर क्यों फट जाती हैं ग्लेशियर झीलें?

ग्लेशियर झीलें सामान्य झीलों से अलग होती हैं। अक्सर इनके किनारे या नीचे बर्फ, मलबे और चट्टानों से बना प्राकृतिक बांध होता है। जब यह बांध अचानक कमजोर होकर टूटता है, तो जमा हुआ पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर बहता है। इसी घटना को Glacier Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है।

1. ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना

बढ़ते वैश्विक तापमान का असर हिमालयी ग्लेशियरों पर भी पड़ रहा है। बर्फ पिघलने से:

नई ग्लेशियर झीलें बनती हैं → पुरानी झीलें बड़ी होती हैं → पानी का दबाव बढ़ता है → प्राकृतिक बांध पर खतरा बढ़ता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों में लगातार यह चेतावनी सामने आती रही है कि तापमान बढ़ने की स्थिति में हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में बर्फ का नुकसान बढ़ सकता है और इसके साथ ग्लेशियर झीलों का आकार तथा संख्या भी बढ़ सकती है।

2. बर्फ या पहाड़ का बड़ा हिस्सा झील में गिरना

कई बार भूस्खलन, हिमस्खलन या चट्टानों का बड़ा हिस्सा सीधे ग्लेशियर झील में गिर जाता है। इससे झील में अचानक विशाल लहर पैदा हो सकती है।

यह लहर प्राकृतिक बांध से टकराती है और यदि बांध कमजोर हो तो उसे तोड़ सकती है। इसके बाद झील का पानी कुछ ही समय में नीचे की घाटियों में विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लेता है।

हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में दर्ज GLOF घटनाओं में हिमस्खलन और भूस्खलन महत्वपूर्ण ट्रिगर माने गए हैं।

3. अचानक और अत्यधिक बारिश

मूसलाधार बारिश भी ग्लेशियर झीलों के लिए बड़ा खतरा है। लगातार बारिश होने पर झील का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। पानी का दबाव प्राकृतिक बांध की क्षमता से अधिक हुआ तो बांध टूट सकता है।

इसके अलावा भूकंप, पहाड़ों में अनियंत्रित निर्माण, खनन, पेड़ों की कटाई और हाइड्रोपावर परियोजनाओं जैसी गतिविधियां भी संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।

क्या GLOF की तबाही को पहले रोका जा सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार GLOF को पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन समय रहते खतरे की पहचान करके नुकसान को काफी कम किया जा सकता है।

NDMA और राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत जिन उपायों पर जोर दिया जाता है, उनमें शामिल हैं:

  • सैटेलाइट इमेजरी से संवेदनशील झीलों की निगरानी।
  • फील्ड सर्वे और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर जोखिम का आकलन।
  • पानी के स्तर पर नजर रखने के लिए सेंसर और रडार आधारित निगरानी।
  • प्राकृतिक बांध में होने वाले बदलाव की अर्ली वार्निंग सिस्टम से पहचान।
  • जरूरत पड़ने पर नियंत्रित तरीके से पानी निकालने के लिए कृत्रिम ड्रेनेज चैनल बनाना।
  • संवेदनशील इलाकों में अनियंत्रित निर्माण और भारी इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियों को सीमित करना।

सबसे बड़ा सवाल हालांकि जलवायु परिवर्तन का है। अगर ग्लेशियर लगातार तेजी से पिघलते रहे तो केवल किसी एक झील की निगरानी करना पर्याप्त नहीं होगा।

क्या नेपाल की बाढ़ का असर बिहार तक पहुंच सकता है?

नेपाल की भोटेकोशी नदी का पानी आगे चलकर सुनकोशी और फिर सप्तकोशी नदी तंत्र का हिस्सा बनता है। यह नदी तंत्र आगे भारत में प्रवेश करके कोसी नदी का रूप लेता है।

इसी वजह से नेपाल में अचानक बढ़ा पानी भारत के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है। विशेषकर बिहार के सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जैसे निचले इलाकों पर नजर रखी जाती है।

कोसी को बिहार में लंबे समय से ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है, क्योंकि इसका इतिहास विनाशकारी बाढ़ों से जुड़ा रहा है।

2008 की कोसी बाढ़ ने दिखाया था नदी का रौद्र रूप

साल 2008 में नेपाल के कुसहा में कोसी का तटबंध टूट गया था। इसके बाद नदी अपने मौजूदा रास्ते से हटकर पुराने मार्ग की ओर बहने लगी।

नतीजा बेहद भयावह था। 34 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए और बड़ी संख्या में गांव तथा कृषि क्षेत्र पानी में डूब गए।

हालांकि मौजूदा स्थिति को 2008 जैसी घटना से सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा। अभी उपलब्ध जानकारी के मुताबिक नदी ने अपना रास्ता नहीं बदला है और पानी अपने प्राकृतिक प्रवाह में ही आगे बढ़ रहा है। इसलिए फिलहाल विशेषज्ञ 2008 जैसी स्थिति की आशंका नहीं जता रहे हैं।

बिहार में भी अलर्ट, बैराज के गेट खोले गए

नेपाल में भारी बारिश और पहाड़ी क्षेत्रों से पानी आने की आशंका के बीच पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकिनगर गंडक बैराज के सभी 36 गेट खोले जाने की जानकारी सामने आई है।

वहीं बिहार के 8 जिलों में हाई अलर्ट जारी किया गया है। इनमें:

पश्चिमी चंपारण (बगहा), पूर्वी चंपारण (मोतिहारी), गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी और शिवहर शामिल हैं।

हिमालय का बदलता चेहरा दे रहा है चेतावनी

ग्लेशियर झीलों की बढ़ती संख्या केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं है। यह मानव बस्तियों, पेयजल, कृषि, सड़क, पुल, बिजली परियोजनाओं और पूरे नदी तंत्र की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।

नेपाल की हालिया त्रासदी ने एक बार फिर बता दिया है कि हिमालय में जमा पानी जब अचानक अपना रास्ता बनाता है तो तबाही के लिए कुछ मिनट ही काफी होते हैं।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि खतरनाक 88 ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी, समय पर चेतावनी और स्थानीय आबादी तक तुरंत सूचना पहुंचाने की व्यवस्था कितनी मजबूत की जाती है।

हिमालय में बदलती बर्फ को केवल पहाड़ों की समस्या मानना अब पर्याप्त नहीं है—क्योंकि वहां होने वाला बदलाव नीचे बहने वाली हर नदी और उसके किनारे बसे लाखों लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर सकता है।

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