
18 इंच की लोहे की रॉड सीने में धंसी, 6 घंटे की जटिल सर्जरी से 30 वर्षीय युवक को मिली जिंदगी…
युवक की छाती से निकाली रॉड, मिला नया जीवन…
गंभीर हालत में युवक को लाया गया था गीतांजलि हॉस्पिटल, उदयपुर
करीब 6 घंटे चली जटिल सर्जरी में रॉड को सुरक्षित तरीके से निकाला
डॉ. संजय गांधी के नेतृत्व में विशेषज्ञ टीम ने किया ऑपरेशन
संदीप बहल,
उदयपुर। एक दर्दनाक सड़क हादसे में 30 वर्षीय युवक के सीने में करीब 18 इंच लंबी लोहे की रॉड धंस गई। हालत इतनी गंभीर थी कि छाती की दीवार, फेफड़े और महत्वपूर्ण रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो गईं और अंदरूनी रक्तस्राव के साथ हृदय पर भी दबाव पड़ रहा था।
बांसवाड़ा से बेहद नाजुक स्थिति में गीतांजलि मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, उदयपुर लाए गए युवक के लिए चिकित्सकों ने बिना समय गंवाए उपचार शुरू किया। करीब छह घंटे तक चली बेहद चुनौतीपूर्ण सर्जरी के बाद डॉक्टरों की टीम ने रॉड निकालकर क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत की और युवक की जान बचाने में सफलता हासिल की।
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ऑटो-बुलेट की टक्कर में सीने में गहराई तक धंसी लोहे की रॉड

युवक के सीने में धंसी 18 इंच की लोहे की रॉड ऑपरेशन कर डॉक्टर्स ने निकाली।
हादसा बांसवाड़ा में ऑटो और बुलेट मोटरसाइकिल की आमने-सामने की टक्कर के बाद हुआ। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि ऑटो के साइड-व्यू मिरर से जुड़ी लोहे की रॉड युवक की छाती को चीरते हुए शरीर के अंदर तक जा धंसी।
रॉड के अंदर तक प्रवेश करने से चेस्ट वॉल, फेफड़े और महत्वपूर्ण रक्त वाहिकाओं को गंभीर चोट पहुंची। शरीर के भीतर हो रहे रक्तस्राव और हृदय पर पड़ रहे दबाव ने मरीज की स्थिति को बेहद चिंताजनक बना दिया था। ऐसे समय में हर गुजरता पल महत्वपूर्ण था। गंभीर स्थिति को देखते हुए मरीज को तत्काल बांसवाड़ा से उदयपुर के गीतांजलि हॉस्पिटल रेफर किया गया।
अस्पताल पहुंचते ही शुरू हुई इमरजेंसी तैयारी
गीतांजलि हॉस्पिटल पहुंचते ही चिकित्सकों ने मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए बिना समय गंवाए उसे ऑपरेशन थिएटर में शिफ्ट किया। कार्डियक सर्जरी, कार्डियक एनेस्थीसिया, ऑपरेशन थिएटर और आईसीयू की टीम ने मिलकर तत्काल आवश्यक चिकित्सा प्रक्रिया शुरू की। मरीज की स्थिति ऐसी थी कि रॉड को निकालना अपने आप में बेहद जोखिम भरा कदम था, क्योंकि उसके आसपास महत्वपूर्ण रक्त वाहिकाएं और फेफड़े प्रभावित थे।
छह घंटे चली जिंदगी बचाने वाली जटिल सर्जरी
रात में शुरू हुआ ऑपरेशन करीब छह घंटे तक चला। सर्जरी के दौरान चिकित्सकों ने अत्यंत सावधानी के साथ सीने में फंसी लोहे की रॉड को बाहर निकाला। इसके बाद क्षतिग्रस्त रक्त वाहिकाओं, छाती की दीवार और फेफड़े में हुई चोटों की मरम्मत की गई। ऑपरेशन के दौरान अंदरूनी रक्तस्राव को नियंत्रित करना और हृदय पर पड़ रहे दबाव को कम करना चिकित्सकों के सामने बड़ी चुनौती थी।
इस पूरी प्रक्रिया में चिकित्सकों को एक-एक कदम बेहद सावधानी से उठाना पड़ा, क्योंकि रॉड को अचानक हटाने से गंभीर रक्तस्राव या अन्य जटिलता का खतरा हो सकता था।
विशेषज्ञ टीम ने मिलकर संभाला चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन
इस जटिल सर्जरी को कार्डियक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. संजय गांधी के नेतृत्व में सर्जिकल टीम ने सफलतापूर्वक पूरा किया। टीम में डॉ. शोभित माथुर, डॉ. सागर और डॉ. बृजेश शामिल रहे। सर्जरी के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर बनाए रखने की जिम्मेदारी कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डॉ. कल्पेश और डॉ. सुमित ने संभाली। वहीं ओटी और आईसीयू टीम के समन्वित प्रयास से मरीज को गंभीर स्थिति से बाहर निकालने में मदद मिली।
समय पर इलाज ने बचाई जिंदगी
यह मामला सिर्फ एक जटिल सर्जरी की सफलता नहीं, बल्कि गंभीर दुर्घटना के बाद समय पर सही अस्पताल तक पहुंचने और विशेषज्ञ चिकित्सकीय टीम के तुरंत सक्रिय होने की अहमियत को भी सामने लाता है। ऐसे ट्रॉमा मामलों में मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है। इस घटना में त्वरित रेफरल, तत्काल ऑपरेशन की तैयारी और कार्डियक सर्जरी, एनेस्थीसिया, ओटी तथा आईसीयू टीम के बीच बेहतर समन्वय उपचार की सफलता में महत्वपूर्ण रहा।
गीतांजलि मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में किया गया यह जटिल उपचार गंभीर ट्रॉमा के मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सा और टीमवर्क की भूमिका को रेखांकित करता है।
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