राजस्थान एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट पर हाईकोर्ट सख्त… मुख्य सचिव को पेश होने की चेतावनी!

राजस्थान एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट पर हाईकोर्ट सख्त… मुख्य सचिव को पेश होने की चेतावनी!

एडवोकेट प्रोटेक्शन बिल पर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त

सरकार को 4 सप्ताह में निर्णय लेने के निर्देश

नहीं तो, 4 सप्ताह बाद मुख्य सचिव को पेश होकर देना होगा स्पष्टीकरण

हाईकोर्ट का एडवोकेट्स प्रोटेक्शन बिल-2023 पर 4सप्ताह में अंतिम निर्णय लेने का निर्देश

हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर के पूर्व अध्यक्ष प्रहलाद शर्मा की है याचिका 

विधेयक वर्ष 2023 में गहलोत सरकार के कार्यकाल में हुआ था विधानसभा से पारित

महावीर सिंह

जयपुर,dusrikhabar.com। राजस्थान में वकीलों की सुरक्षा से जुड़े एडवोकेट्स प्रोटेक्शन बिल-2023 पर लंबे समय से निर्णय लंबित रहने का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से स्पष्ट कहा है कि चार सप्ताह के अंदर बिल पर अंतिम निर्णय ले। ऐसा नहीं होने पर मुख्य सचिव को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर देरी के संबंध में स्पष्टीकरण देना होगा। यह मामला प्रदेश के उन वकीलों की सुरक्षा और कल्याण से जुड़ा है, जो लंबे समय से प्रभावी संरक्षण व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।

वकीलों की सुरक्षा के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल शामिल हैं, ने एडवोकेट्स प्रोटेक्शन बिल पर कार्रवाई में देरी को लेकर राज्य सरकार से सवाल किए।

खंडपीठ ने यह निर्देश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर के पूर्व अध्यक्ष प्रहलाद शर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए। अदालत ने सरकार से जानना चाहा कि मई 2025 के बाद से इस विधेयक पर निर्णय लेने की दिशा में आगे कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

अदालत ने सरकार को अब इस मामले में समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि निर्धारित अवधि में निर्णय नहीं होने पर मुख्य सचिव को अदालत में उपस्थित होकर जवाब देना पड़ सकता है।

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मई 2025 से क्यों लंबित है एडवोकेट प्रोटेक्शन बिल?

एडवोकेट्स प्रोटेक्शन बिल-2023 राजस्थान में वकीलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया था। हालांकि, विधानसभा से पारित होने के बाद भी इस पर आगे की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक पत्र की प्रति अदालत में प्रस्तुत की गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 26 मई 2026 को लिखे गए इस पत्र में विधेयक पर पुनर्विचार करने, उसकी समीक्षा करने अथवा उसे वापस लेने के संबंध में आग्रह किया गया था।

इसके बाद 25 जून को इस विषय पर टिप्पणियां मांगी गई थीं। हालांकि, इन प्रक्रियाओं के बावजूद विधेयक पर अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका।

इसी पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने सरकार को चार सप्ताह का समय दिया है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार इस अवधि में विधेयक पर क्या फैसला करती है।

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गहलोत सरकार के कार्यकाल में विधानसभा से पारित हुआ था विधेयक

यह विधेयक वर्ष 2023 में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल के दौरान राजस्थान विधानसभा से पारित हुआ था। इसका उद्देश्य वकीलों को उनके पेशे से जुड़े कार्यों के दौरान सुरक्षा प्रदान करने के लिए कानूनी व्यवस्था तैयार करना था।

हालांकि, विधेयक के पारित होने के बाद आगे की प्रक्रिया लंबित रहने से इसके लागू होने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।

वकीलों के लिए यह मुद्दा केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। इसका संबंध उनकी पेशेवर सुरक्षा, स्वतंत्र रूप से पैरवी करने और अपने दायित्वों का निर्वहन करने के अधिकार से भी है।

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याचिका में सुरक्षा के साथ वकीलों के कल्याण की मांग

प्रहलाद शर्मा की याचिका में केवल वकीलों की सुरक्षा का मुद्दा ही नहीं उठाया गया, बल्कि उनके आर्थिक और सामाजिक कल्याण से जुड़े विषयों पर भी ध्यान दिलाया गया है।

याचिका में प्रमुख रूप से निम्न मांगें रखी गई हैं:

  • एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट से संबंधित प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।

  • वकीलों के वेलफेयर फंड में निर्धारित राशि के अंशदान से जुड़े मुद्दे पर कार्रवाई हो।

  • नए वकीलों को शुरुआती पेशेवर जीवन में आर्थिक सहायता देने के लिए स्टाइपेंड की व्यवस्था की जाए।

  • प्रदेश के अधिवक्ताओं के लिए ऐसी कल्याणकारी योजनाओं पर विचार किया जाए, जिनसे उन्हें पेशेवर चुनौतियों के बीच सहायता मिल सके।

याचिका में यह भी कहा गया है कि अन्य राज्यों में वकीलों के कल्याण के लिए योजनाएं संचालित हैं, जबकि राजस्थान के अधिवक्ताओं को ऐसी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

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चार सप्ताह में निर्णय, अब सरकार के अगले कदम पर नजर

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब राज्य सरकार के सामने विधेयक पर अंतिम निर्णय लेने की समयसीमा है। यदि निर्धारित चार सप्ताह में निर्णय नहीं लिया जाता है, तो मुख्य सचिव को अदालत में उपस्थित होकर देरी का स्पष्टीकरण देना होगा।

वकीलों के लिए इस मामले का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि सुरक्षा, आर्थिक सहायता और पेशेवर सम्मान से जुड़े ये मुद्दे सीधे उनके कार्यक्षेत्र को प्रभावित करते हैं। अब अदालत के निर्देशों के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार विधेयक पर आगे क्या कदम उठाती है और वकीलों की लंबित मांगों को लेकर क्या निर्णय सामने आता है।

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