
2027 विधानसभा चुनावों में यूपी में सपा की राह नहीं आसान, क्या सपा अपनाएगी एक सीट, एक घोषणा पत्र का फॉर्मूला…?
यूपी 2027: सपा के सामने बड़ा सवाल—PDA का विस्तार वोट में बदलेगा या नहीं?
2027 की चुनौती केवल जातीय समीकरण नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दे और बूथ स्तर का संगठन भी
कांग्रेस के साथ संभावित तालमेल और सीट बंटवारा भी विपक्षी रणनीति का महत्वपूर्ण पहलू
लोस 2024 की सफलता को विधानसभा 2027 में दोहराने के लिए सपा को बनानी होगी रणनीति
PDA रणनीति में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों माने जा रहे व्यापक सामाजिक गठजोड़
विजय श्रीवास्तव
जयपुर/लखनऊ, dusrikhabar.com। उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव की तैयारियों का बिगुल बज चुका है हर पार्टी अपने-अपने सामर्थ्य से चुनावों को अपने पक्ष में करने के प्रयास में जुट गई है और एक बार फिर सामाजिक समीकरणों और जमीनी मुद्दों की चर्चा तेज हो गई है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने जिस तरह की कोशिश करते हुए गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित समाज को अपने पक्ष में करने की दौड़-धूप तेज की है उससे केवल चुनाव जीतना पार्टी का मकसद नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी की नींव को एक बार फिर से मजबूती प्रदान करना मुख्य उद्देश्य नजर आ रहा है।
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2024 की लोकसभा जीत जैसा दोहराव क्या होगा संभव
उल्लेखनीय है कि सपा का यह प्रयास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार से आगे जाकर PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति को मुख्य रूप से आधार बनाते हुए 62 सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटों पर जीत भी हासिल कर की थी। पार्टी ने बड़ा दांव खेलते हुए केवल पांच यादवों को टिकट दिया, जबकि 27 उम्मीदवार गैर-यादव OBC समुदायों के थे। लेकिन लोकसभा चुनाव की सफलता क्या विधानसभा चुनावों में दोहराने में पार्टी सफल होगी? इस समय यही सपा की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा बनी हुई है।
2024 में कैसे बदली तस्वीर, फिर कहानी अधूरी क्यों: लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन को ओबीसी-दलित और अल्पसंख्यकों का पूरा समर्थन मिला। यूपी में समाजवादी पार्टी को 37 सीटें मिलीं वहीं भाजपा केवल 33 सीटों पर ही सिमट कर रह गई। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 17 सीटों में से भाजपा को 8 सपा को 7 और कांग्रेस को एक सीट मिली। इसके मायने ये हैं कि उत्तरप्रदेश का मतदाताओं को रोजगार, आरक्षण, संविधान और स्थानीय समस्याओं जैसे मुद्दों ने प्रभावित किया। बावजूद इसके भाजपा को वोट शेयर करीब 41.7 फीसदी रहा जो कि भाजपा के लिए बड़ा आंकड़ा था। इसलिए अब सपा के सामने चुनौती केवल नए मतदाताओं को जोड़ने की नहीं, बल्कि उन्हें लंबे समय तक अपने साथ जोड़े रखने की भी है।
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दलित और गैर-यादव OBC तक पहुंच सबसे बड़ी चुनौती
दरअसल दलित राजनीति में जगह बनाना आसान काम नहीं है। यही कारण है कि अब सपा की PDA रणनीति में कुर्मी, मौर्य, सैनी, निषाद, प्रजापति, पाल और गड़रिया जैसे समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिश और तेज हो गई है। यहां हर जाति में अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। किसी इलाके में सिंचाई बड़ा मुद्दा हो सकता है तो किसी दूसरे क्षेत्र में रोजगार, सड़क, बिजली या सरकारी योजनाओं तक पहुंच। इसलिए काफी सोच-समझ के बाद सपा की जिला-वार घोषणापत्र तैयार करने की पहल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सपा अब यूपी में बूथ समितियों का विस्तार कर लोगों की स्थानीय समस्याओं और मुद्दों तक अपनी पैठ बना रही है जिसकी असली परीक्षा बूथ पर चुनाव के समय होगी क्योंकि जातीय समीकरणों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी को मुद्दों की राजनीति भी करनी होगी।
75 जिले, 75 स्थानीय मुद्दे—क्या बनेगा सपा का नया फॉर्मूला?
गौरतलब है कि सपा यूपी में एक जिला, एक घोषणापत्र (75 Manifestos) का फॉर्मूला अपना रही है यानि 75 जिलों के लिए 75 अलग स्थानीय घोषणापत्र पार्टी तैयार कर रही है। इसके जरिए हर जिले की अपनी विशिष्ट आर्थिक, सामाजिक समस्याओं और युवाओं की आकांक्षाओं को सीधे संबोधित कर उन्हें अपने साथ जोड़ने का प्रयास रहेगा।
यूपी के वरिष्ठ राजनीतिक सलाहकारों या विश्लेषकों की मानें तो पीडीए अब केवल पार्टी के लिए चुनावी नारा नहीं रह गया है बल्कि पार्टी के साथ अगर गैर यादव ओबीस और गैर जाटव दलितों ने साथ दिया तो सपा के दोनों हाथ घी में और सिर कढ़ाई में होगा। अब यही वजह है कि 2027 का चुनाव सपा के लिए केवल सरकार बनाने की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने पुराने राजनीतिक आधार को नए सामाजिक गठजोड़ में बदलने की परीक्षा साबित होगा जो सपा को हर तरह से मजबूती और सक्षमता प्रदान करेगा।
जमीन पर पीडीए की राजनीति का परिणाम
यूपी की राजनीति में जातीय पहचान महत्वपूर्ण है, लेकिन मतदाता केवल जाति नहीं है। वह किसान भी है, युवा भी है, नौकरी चाहने वाला भी है, कारोबारी भी है और अपने गांव की सड़क-पानी-बिजली से परेशान नागरिक भी। ऐसे में सपा की PDA राजनीति की वास्तविक सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि वह जातीय प्रतिनिधित्व की राजनीति को सामाजिक न्याय और स्थानीय समस्याओं की राजनीति में कितनी मजबूती से बदल पाती है और 2027 में इसका जवाब सिर्फ चुनावी आंकड़े देंगे।
बहरहाल उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव भाजपा और विपक्ष के बीच संगठन, सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दों की बहुस्तरीय लड़ाई बनता नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व, विकास और हिंदुत्व के मुद्दों के साथ अपने मजबूत संगठन पर भरोसा कर रही है। वहीं समाजवादी पार्टी PDA के दायरे को बढ़ाकर गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलितों तक पहुंच बनाने में जुटी है। कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन में सीटों का बंटवारा अहम मुद्दा रहेगा। ऐसे में यूपी में चुनावी मुकाबला केवल पारंपरिक वोट बैंक का नहीं होगा, बल्कि सामाजिक गठजोड़, जमीनी संगठन, उम्मीदवार चयन और स्थानीय समस्याओं पर भरोसा कायम करने की क्षमता भी निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
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