
पानी की हर बूंद बचाने का संकल्प, गीतांजलि मेडिकल कॉलेज में बताया कैसे घटेगा वॉटर फुटप्रिंट और बढ़ेगा भूजल स्तर
गीतांजलि मेडिकल कॉलेज में ब्रिक्स सस्टेनेबल लाइफस्टाइल वीक पर जल संरक्षण व्याख्यान
जल मित्र डॉ. पी.सी. जैन ने ‘वॉटर फुटप्रिंट घटाएं, रिचार्ज बढ़ाएं’ विषय पर बताईं महत्वपूर्ण बातें
अत्यधिक भूजल दोहन से जमीन धंसने और जल संकट का बताया खतरा
प्रत्येक ट्यूबवेल के साथ रिचार्ज सिस्टम लगाने की भी बताई जरूरत
विद्यार्थियों को जल संरक्षण को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश
सोनिया
उदयपुर,dusrikhabar.com। पानी की कमी केवल भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि आज हमारे शहरों और गांवों के सामने खड़ी होती गंभीर चुनौती है। जिस पानी को हम रोजमर्रा की जिंदगी में सहजता से इस्तेमाल करते हैं, उसके पीछे प्राकृतिक संसाधनों पर कितना दबाव पड़ रहा है, इसका अंदाजा भी अक्सर नहीं लगा पाते। इसी अनदेखे संकट के प्रति जागरूकता बढ़ाने और जल संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाने के उद्देश्य से गीतांजलि मेडिकल कॉलेज, उदयपुर में ब्रिक्स सस्टेनेबल लाइफस्टाइल वीक के तहत विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। इसमें विशेषज्ञों ने ‘वॉटर फुटप्रिंट घटाने और भूजल रिचार्ज बढ़ाने’ को आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए जरूरी बताया।
पानी का संकट केवल उपलब्धता का नहीं, हमारी आदतों का भी सवाल
गीतांजलि मेडिकल कॉलेज में डीन डॉ. संगीता गुप्ता के मार्गदर्शन और कम्युनिटी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. मुकुल दीक्षित के निर्देशन में जल संरक्षण पर विशेष अतिथि व्याख्यान हुआ। यह आयोजन ब्रिक्स सस्टेनेबल लाइफस्टाइल वीक (BSLW) के अंतर्गत किया गया।
कार्यक्रम का समन्वय डॉ. हेमलता मित्तल ने किया, जबकि संचालन डॉ. अंशिका जैन ने किया। इसमें गीतांजलि विश्वविद्यालय के विभिन्न संस्थानों के शिक्षक, विशेषज्ञ और विद्यार्थी शामिल हुए।

एक कोट बनाने में खर्च होता है 3 हजार लीटर अदृश्य पानी
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जल मित्र डॉ. पी.सी. जैन ने ‘वॉटर फुटप्रिंट घटाएं, रिचार्ज बढ़ाएं’ विषय पर व्याख्यान देते हुए पानी के उपयोग से जुड़े ऐसे पहलुओं की जानकारी दी, जिन पर आमतौर पर लोगों का ध्यान नहीं जाता।
उन्होंने बताया कि किसी उत्पाद के निर्माण में प्रत्यक्ष पानी के अलावा बड़ी मात्रा में ऐसा पानी भी खर्च होता है, जो हमें दिखाई नहीं देता। इसे वॉटर फुटप्रिंट या अदृश्य जल कहा जाता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि एक कोट तैयार करने में लगभग 3,000 लीटर पानी खर्च होता है।
उन्होंने कहा कि पानी का निर्माण संभव नहीं है। हमारे पास उपलब्ध जल संसाधनों को ही संरक्षित करना होगा। इसके लिए जितना जरूरी पानी की खपत कम करना है, उतना ही जरूरी वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल रिचार्ज बढ़ाना भी है।
भूजल का अंधाधुंध दोहन बन रहा शहरों के लिए खतरा
डॉ. जैन ने चेताया कि लगातार भूजल निकालने का असर अब जमीन की स्थिरता और शहरों की जल व्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। अत्यधिक भूजल दोहन के कारण जमीन धंसने जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। उन्होंने बेंगलुरु जैसे शहरों में सामने आए जल संकट का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राकृतिक जल संसाधनों के प्रति लापरवाही भविष्य में गंभीर परिस्थितियां पैदा कर सकती है।
उन्होंने ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका के हवाले से बताया कि देश में लगभग 62 प्रतिशत सीवेज बिना उपचार के नदियों में बहाया जा रहा है। इसके साथ ही प्लास्टिक प्रदूषण भी जल स्रोतों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
हर ट्यूबवेल के साथ हो रिचार्ज सिस्टम, बारिश का पानी जमीन तक पहुंचे
व्याख्यान के दौरान डॉ. पी.सी. जैन ने भारतीय पारंपरिक ज्ञान का उल्लेख करते हुए ‘अष्टांग हृदयम्’ में वर्षा जल को अमृत के समान महत्व दिए जाने की बात कही। उन्होंने जल संरक्षण के लिए कुछ व्यावहारिक उपाय भी सुझाए। इनमें प्रत्येक ट्यूबवेल के साथ वर्षा जल रिचार्ज सिस्टम विकसित करना और फुटपाथों पर ऐसी टाइल्स लगाना शामिल है, जिनसे बारिश का पानी जमीन में समा सके।
उन्होंने कहा कि बारिश के पानी को नालों के रास्ते बहने देने के बजाय जमीन के भीतर पहुंचाने की व्यवस्था विकसित करनी होगी। छोटे-छोटे प्रयास मिलकर भूजल स्तर को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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नुक्कड़ नाटक और जल नृत्य से विद्यार्थियों ने दिया संरक्षण का संदेश
कार्यक्रम में जल संरक्षण को केवल व्याख्यान तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि विद्यार्थियों ने रचनात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से भी लोगों को जागरूक किया। गीतांजलि विश्वविद्यालय के विभिन्न संस्थानों की छात्राओं ने फ्लोरोसिस विषय पर लघु नाटिका प्रस्तुत की। वहीं प्रथम वर्ष के एमबीबीएस विद्यार्थियों ने ‘जल ही जीवन है’ विषय पर जल नृत्य के माध्यम से पानी बचाने का संदेश दिया।
इन प्रस्तुतियों ने यह समझाने का प्रयास किया कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं या विशेषज्ञों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की रोजमर्रा की आदतों से भी जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों और विद्यार्थियों की रही सहभागिता
कार्यक्रम में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग से डॉ. ज्योति जैन, डॉ. भगराज चौधरी, डॉ. सुरेश चौधरी, डॉ. मनीष, डॉ. प्रभात, डॉ. मुदित, डॉ. पूर्णिमा, डॉ. प्रेरणा और डॉ. तनीषा मौजूद रहे।
इस आयोजन के माध्यम से विद्यार्थियों को जल संकट के पर्यावरणीय, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं को समझने का अवसर मिला। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और जिम्मेदार उपभोग को व्यक्तिगत जीवनशैली का हिस्सा बनाना समय की जरूरत है।
आखिरकार पानी बचाने का अर्थ केवल आज की जरूरत पूरी करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का सबसे जरूरी संसाधन सुरक्षित रखना भी है।
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