
3 नेशनल-4 फिल्मफेयर और पद्मश्री से सम्मानित अभिनेता नाना पाटेकर के निधन से सिनेमा में गहरा सन्नाटा…
नहीं रहे नाना पाटेकर, 75 की उम्र में कार्डियक अरेस्ट ने छीन लिया एक बेमिसाल कलाकार
‘परिंदा’ के अन्ना से ‘क्रांतिवीर’ के प्रताप नारायण तक… दमदार आवाज और अभिनय
गोवा स्थित आवास पर गंभीर कार्डियक अरेस्ट के बाद उन्हें अस्पताल में ली अंतिम सांस
तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार फिल्मफेयर अवॉर्ड उनके नाम रहे।
2013 में पद्म श्री नाना पाटेकर को किया गया था सम्मानित
‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में यादगार किया अभिनय
2026 में ‘ओ‘रोमियो’ और ‘सूबेदार’ में नजर आए थे नाना पाटेकर
विजय श्रीवास्तव/माही राठौड़
जयपुर/गोवा,dusrikhabar.com। भारतीय सिनेमा ने आज अपना एक ऐसा कलाकार खो दिया, जिसकी पहचान केवल पर्दे पर निभाई गई भूमिकाओं से नहीं, बल्कि उसकी आवाज, संवाद अदायगी और अभिनय की सच्चाई से बनी थी। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में गोवा में निधन हो गया। उन्हें सुबह गंभीर कार्डियक अरेस्ट के बाद अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक CPR देकर उन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। अस्पताल के अनुसार उन्हें सुबह 5:20 बजे मृत घोषित किया गया।
उनके निधन की खबर सामने आते ही हिंदी और मराठी फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई। एक ऐसा अभिनेता, जिसने खलनायक, नायक, पुलिस अधिकारी, गैंगस्टर, राजनेता और आम इंसान—हर किरदार को अपनी अलग पहचान दी, आज पर्दे से हमेशा के लिए विदा हो गया।
कैसे थमी नाना पाटेकर की सांसें?
नाना पाटेकर गोवा स्थित अपने आवास पर थे, जहां वे गंभीर कार्डियक अरेस्ट के बाद अचेत अवस्था में पाए गए। उन्हें तत्काल मणिपाल अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में चिकित्सकों ने लगभग 45 मिनट तक लगातार CPR किया, लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। अस्पताल के डॉ. शेखर सालकर के अनुसार इस मामले में मेडिको-लीगल केस (MLC) दर्ज किया गया है और पोस्टमार्टम किया जाना है। परिवार की ओर से भी शुरुआती जानकारी में उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने निधन की पुष्टि की है।

नाना पाटेकर की प्रमुख फिल्में…
एक ऐसा कलाकार जिसकी आवाज ही उसकी पहचान बन गई
नाना पाटेकर का जन्म विश्वनाथ पाटेकर के रूप में हुआ था। उन्होंने थिएटर से अभिनय की शुरुआत की और वर्ष 1978 में फिल्म ‘गमन’ से फिल्मों की दुनिया में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने हिंदी और मराठी सिनेमा में ऐसा मुकाम बनाया, जहां उनकी पहचान किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं रही।
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‘अंकुश’, ‘सलाम बॉम्बे!’, ‘परिंदा’, ‘प्रहार’, ‘अंगार’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग किरदारों ने दर्शकों और आलोचकों दोनों पर गहरी छाप छोड़ी। बाद के दौर में ‘वेलकम’ और ‘वेलकम बैक’ के उदय शेट्टी ने उनकी अभिनय प्रतिभा का एक बिल्कुल अलग रंग दर्शकों के सामने रखा। गंभीर और तीखे किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले नाना ने कॉमेडी में भी उतनी ही सहजता से अपनी जगह बनाई।
तीन नेशनल अवॉर्ड और चार फिल्मफेयर अवॉर्ड
नाना पाटेकर का फिल्मी सफर पुरस्कारों और उपलब्धियों से भी समृद्ध रहा। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। ‘परिंदा’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए फिर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2013 में पद्म श्री से सम्मानित किया था।
‘परिंदा’ का अन्ना आज भी याद किया जाएगा
1989 की फिल्म ‘परिंदा’ में नाना पाटेकर का ‘अन्ना’ किरदार उनके करियर के सबसे प्रभावशाली पड़ावों में रहा। इसके बाद ‘क्रांतिवीर’ में उनके अभिनय ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर और बड़ी पहचान दिलाई। नाना की खासियत यह थी कि वे किरदार को केवल निभाते नहीं थे, उसमें अपनी पूरी ऊर्जा और संवेदना भर देते थे। यही वजह रही कि उनके निभाए किरदार फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के मन में बने रहे।
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मराठी सिनेमा में भी छोड़ी अमिट छाप
हिंदी सिनेमा के साथ नाना पाटेकर मराठी फिल्मों के भी बेहद सम्मानित कलाकार रहे। ‘नटसम्राट’ में उनके अभिनय को व्यापक प्रशंसा मिली और उन्हें मराठी फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। अभिनय के साथ उन्होंने निर्देशन और लेखन में भी हाथ आजमाया। उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ रही, जिसने उनके भीतर मौजूद फिल्मकार को भी सामने रखा।
आखिरी दौर तक कैमरे से जुड़े रहे
नाना पाटेकर ने उम्र के इस पड़ाव पर भी अभिनय से दूरी नहीं बनाई। 2026 में वे ‘ओ‘रोमियो’ और ‘सूबेदार’ में नजर आए। इसके अलावा उनके हालिया काम में ‘हाउसफुल 5’ और ‘वनवास’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं। ‘ओ’रोमियो’ में उन्होंने शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी के साथ काम किया, जबकि ‘सूबेदार’ में अनिल कपूर के साथ नजर आए।
पर्दे के बाहर भी जमीन से जुड़े रहे नाना
नाना पाटेकर की जिंदगी केवल फिल्मों तक सीमित नहीं थी। संघर्ष से निकलकर शीर्ष तक पहुंचने वाले नाना अपने सादगीपूर्ण जीवन और सामाजिक सरोकारों के लिए भी जाने जाते थे। उनका सफर मुश्किल हालात से शुरू होकर राष्ट्रीय पुरस्कार, पद्म श्री और करोड़ों दर्शकों के प्यार तक पहुंचा। उनकी कहानी इस मायने में भी खास रही कि उन्होंने सफलता को केवल चमक-दमक के रूप में नहीं देखा। संघर्ष, मेहनत और अपने काम के प्रति ईमानदारी उनके व्यक्तित्व की पहचान रहे।
नाना पाटेकर का जाना केवल एक अभिनेता का जाना नहीं
नाना पाटेकर के निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया है जिसकी नकल करना आसान हो सकता है, लेकिन उसकी जगह भरना बेहद मुश्किल होगा। उनकी भारी आवाज, आंखों का भाव, संवाद बोलने का अंदाज और किरदार में उतर जाने की क्षमता उन्हें अपने दौर के दूसरे कलाकारों से अलग बनाती थी। फिल्मों में उनके किरदार खत्म हो गए, लेकिन ‘अन्ना’, ‘प्रताप नारायण तिलक’, ‘उदय शेट्टी’ और ‘नटसम्राट’ जैसे किरदार दर्शकों की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेंगे।
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