
जयपुर में सुरों की होली, अनहद संगीत में सुनंदा ने निभाई बनारस घराने की रीत.
अनहद संगीत श्रृंखला में सुनंदा शर्मा की मोहक प्रस्तुति
होली विशेष रचनाओं से महफिल में बिखरे रंग
शास्त्रीयता और लोक रस का सुंदर मेल
संगीत प्रेमियों के लिए यादगार सांस्कृतिक संध्या
कलाकारों के बीच लय-ताल का बेहतरीन तालमेल
नवीन सक्सेना,
जयपुर, dusrikhabar.com। राजधानी जयपुर में शनिवार शाम शास्त्रीय संगीत की भव्य महफिल सजी, जब अनहद संगीत श्रृंखला की छठी कड़ी में बनारस घराने की प्रसिद्ध गायिका सुनंदा शर्मा ने अपनी सधी हुई और भावपूर्ण प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का आयोजन पर्यटन विभाग, राजस्थान सरकार तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति के संरक्षण के लिए कार्यरत संस्था स्पिक मैक के संयुक्त तत्वावधान में हुआ, जबकि जवाहर कला केंद्र ने स्थल सहयोगी की भूमिका निभाई।
( क्या आप जानते हैं अनहद शब्द का अर्थ है:— जिसकी कोई सीमा न हो या जो बिना किसी टकराव के स्वयं गूंजता रहे, आपको बता दें कि भारतीय आध्यात्मिक और संगीत परंपरा में अनहद नाद का विशेष महत्व है। इसका मतलब होता है वह दिव्य ध्वनि जो भीतर से उत्पन्न होती है, जिसे किसी वाद्य या बाहरी आघात की आवश्यकता नहीं होती।)
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सुर, साधना और संवेदना का अद्भुत संगम
पूरे आयोजन में शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम की गंभीरता और साधना स्पष्ट झलक रही थी। गायिका की प्रस्तुति में वर्षों की रियाज़, सुरों की पवित्रता और भावों की गहराई का सुंदर समन्वय दिखाई दिया। श्रोताओं ने शुरुआत से अंत तक पूरे मनोयोग से हर रचना का आनंद लिया।
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संध्याकालीन रागों से सजी आध्यात्मिक शुरुआत
कार्यक्रम का शुभारंभ राग पूरिया कल्याण से हुआ। विलंबित लय में प्रस्तुत आलाप ने संध्या के वातावरण को भक्ति और गंभीरता से भर दिया। स्वर विस्तार और नियंत्रित तानों ने सभागार में एकाग्रता का वातावरण बना दिया।
इसके बाद राग खंबावती की प्रस्तुति हुई। खमाज थाट से जुड़े इस राग में श्रृंगार और विरह के भावों का सुंदर संतुलन देखने को मिला। सुनंदा शर्मा ने भावों को सहजता से प्रस्तुत करते हुए श्रोताओं को राग की आत्मा से जोड़ दिया।

होली विशेष रचनाओं से महफिल में बिखरे रंग
शास्त्रीय बंदिशों के बाद प्रस्तुति में उत्सव का रंग घुल गया। ठुमरी “होली खेलो मोसे नंदलाल” ने होली के पारंपरिक उल्लास को जीवंत कर दिया। राग बहार में टप्पा “गुलशन में बुलबुल चहकी” ने ऋतु परिवर्तन की छटा बिखेरी।
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चैति “रात हम देखली सपनवा हो रामा” और दादरा “शाम तोहे नजरिया ना लागे” ने लोक और शास्त्रीय संगीत का मधुर मेल प्रस्तुत किया। अंत में मीरा बाई का भजन “तुम सुनो दयाल म्हारी” सुनाकर गायिका ने भक्ति और समर्पण का वातावरण रच दिया। इस प्रकार अनहद संगीत श्रृंखला की यह कड़ी संध्या साधना और होली उत्सव का सुंदर संगम बन गई।
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कलाकारों के बीच लय-ताल का बेहतरीन तालमेल
हारमोनियम पर पंडित विनय मिश्र और तबले पर पंडित शुभ महाराज की संगत ने कार्यक्रम को सशक्त आधार दिया। लय, ताल और सुरों का संतुलन पूरी प्रस्तुति में बना रहा। संगतकारों और गायिका के बीच तालमेल ने हर रचना को प्रभावी और जीवंत बना दिया।
रंगायन सभागार में उमड़ा कला प्रेमियों का उत्साह
रंगायन सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कला प्रेमी, संगीत साधक और पर्यटन विभाग के अधिकारी उपस्थित रहे। पूरा सभागार सुरों की गूंज से भर गया। समापन पर श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कलाकारों का अभिनंदन किया। यह संगीतमय संध्या जयपुर के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक यादगार आयोजन के रूप में दर्ज हो गई।

पर्यटन विभाग और स्पिक मैक की सांस्कृतिक पहल
पर्यटन विभाग, राजस्थान सरकार और स्पिक मैक की यह संयुक्त पहल शहर में भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है। अनहद संगीत श्रृंखला के माध्यम से युवा पीढ़ी और संगीत प्रेमियों को भारतीय सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
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यह आयोजन केवल एक संगीत कार्यक्रम नहीं, बल्कि सुरों, साधना और परंपरा का उत्सव था। जयपुर शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम के रूप में यह संध्या लंबे समय तक कला प्रेमियों की स्मृतियों में बनी रहेगी।
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