
विधायकों को 30 लाख में फ्लैट और पत्रकारों को महंगे आवास का झुनझुना…!
प्रस्तावित फ्लैटों की कीमत 70 से 75 लाख रुपये तक, पत्रकारों के आवास पर सवाल…?
मुख्यमंत्री से पत्रकारों को किफायती आवास पर जवाब की अपेक्षा
विधायकों को द्वारका अपार्टमेंट में करीब 65लाख के फ्लैट 30लाख रुपये में किए थे आवंटित
गहलोत सरकार ने विधायकों को मानसरोवर में आवंटित किए थे सस्ते फ्लैट
पत्रकाराें की आर्थिकी को लेकर अधिकारियों को सरकार को बतानी चाहिए वास्तविक स्थिति
जयपुर के पत्रकारों के हित: स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए प्रदेश के अन्य शहरों के लिए भी अलग आवासीय योजनाओं पर विचार किया जा सकता
नवीन सक्सेना
जयपुर, dusrikhabar.com। राजस्थान में पत्रकारों के लिए आवास का सवाल एक बार फिर सरकार की प्राथमिकताओं और जनहित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता के केंद्र में है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में विधायकों को रियायती दरों पर फ्लैट आवंटित करने और पत्रकारों को कम कीमत पर जमीन उपलब्ध कराने के उदाहरण सामने हैं।
ऐसे में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार से अपेक्षा है कि वह पत्रकारों के लिए भी ऐसी आवासीय व्यवस्था का रास्ता निकाले, जो केवल घोषणा तक सीमित न रहे, बल्कि उनकी आर्थिक क्षमता के भीतर हो। यदि प्रस्तावित फ्लैटों की कीमत 70 से 75 लाख रुपये के आसपास है, तो सीमित आय में काम करने वाले पत्रकारों के लिए अपने घर का सपना पूरा करना कितना व्यावहारिक होगा? यही वह सवाल है, जिसका जवाब सरकार को देना चाहिए।
विधायकों को राहत मिल सकती है, तो पत्रकारों के लिए किफायती आवास क्यों नहीं?
राजस्थान में आवासीय योजनाओं को लेकर एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या सरकारी रियायतों का लाभ केवल कुछ वर्गों तक सीमित रहना चाहिए, या जरूरत और आर्थिक क्षमता के आधार पर दूसरे वर्गों के लिए भी व्यावहारिक समाधान तलाशे जाने चाहिए?
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में बी-टू बाईपास स्थित द्वारका अपार्टमेंट के फ्लैट विधायकों को रियायती दरों पर आवंटित किए जाने का उदाहरण इसी बहस को सामने लाता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन फ्लैटों की कीमत करीब 65 लाख रुपये थी, जबकि आवंटन लगभग 30 लाख रुपये में किया गया। यानी प्रति फ्लैट करीब 35 लाख रुपये की राहत का अंतर बताया गया।
यदि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह अंतर अपने आप में महत्वपूर्ण है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब विधायकों के लिए आवास की कीमत में इतनी बड़ी राहत संभव थी, तो पत्रकारों के लिए किफायती आवास की व्यवस्था तलाशने में क्या बाधा है?
यह सवाल किसी वर्ग को मिलने वाली सुविधा का विरोध नहीं करता। बल्कि यह मांग करता है कि सरकार की आवासीय नीतियों में पात्रता, जरूरत और आर्थिक सामर्थ्य के आधार पर न्यायसंगत अवसर उपलब्ध हों।
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70-75 लाख रुपये का फ्लैट, पत्रकार कैसे जुटाएंगे इतनी बड़ी रकम?
पत्रकारिता में काम करने वाले सभी लोगों की आय एक जैसी नहीं होती। कुछ पत्रकारों को बेहतर वेतन मिलता है, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे पत्रकार भी हैं जिनकी आमदनी सीमित है और जिनकी आर्थिक सुरक्षा नियमित वेतन, पेंशन या अन्य सुविधाओं के अभाव में कमजोर रहती है।
ऐसे में यदि पत्रकारों के लिए प्रस्तावित फ्लैटों की कीमत 70 से 75 लाख रुपये के आसपास रखी जाती है, तो यह देखना जरूरी होगा कि लक्षित वर्ग के कितने लोग इन्हें खरीदने में सक्षम हैं।
घर खरीदने का खर्च केवल फ्लैट की कीमत तक सीमित नहीं होता। इसके साथ डाउन पेमेंट, बैंक ऋण पर ब्याज, हर महीने की ईएमआई, पंजीकरण और अन्य शुल्क भी जुड़ते हैं। इसलिए केवल फ्लैट उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। आवास योजना तभी सार्थक होगी, जब उसकी कीमत और भुगतान की शर्तें पत्रकारों की वास्तविक आर्थिक स्थिति के अनुरूप हों।
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रस्तावित योजना किस आय वर्ग के पत्रकारों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। यदि कीमतें अधिकांश पात्र लोगों की पहुंच से बाहर हैं, तो योजना के स्वरूप और वित्तीय मॉडल की समीक्षा करना जरूरी है।
मुख्यमंत्री तक पहुंचे पत्रकारों की आर्थिक हकीकत
नगरीय विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव आलोक गुप्ता डीआईपीआर सचिव की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। वहीं, वर्तमान डीआईपीआर सचिव डॉ. जितेंद्र सोनी भी पत्रकारों की आवासीय जरूरतों और आर्थिक चुनौतियों से जुड़े पहलुओं को सरकार के सामने रख सकते हैं।
इन अधिकारियों की भूमिका केवल योजना के प्रशासनिक संचालन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें यह भी सुनिश्चित करने में योगदान देना चाहिए कि नीति बनाते समय पत्रकारों की क्रय क्षमता, आय के स्तर और ऋण चुकाने की वास्तविक संभावना का आकलन किया जाए।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के सामने एक स्पष्ट प्रस्ताव रखा जा सकता है—क्या फ्लैटों की कीमत में उचित रियायत, लंबी अवधि में आसान भुगतान, पारदर्शी पात्रता और वित्तीय संस्थानों के सहयोग से ऋण व्यवस्था को अधिक सुलभ बनाया जा सकता है?
सरकार यदि पत्रकारों के लिए आवास योजना को व्यावहारिक बनाना चाहती है, तो इन विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इससे योजना का लाभ केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित रहने के बजाय अधिक पात्र पत्रकारों तक पहुंच सकता है।
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जयपुर के पत्रकारों के हितों की अनदेखी भी न हो
पत्रकारों के लिए आवासीय सुविधा का लाभ पूरे राजस्थान के पत्रकारों तक पहुंचाने का विचार व्यापक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में काम करने वाले पत्रकारों की आवासीय जरूरतें हैं और उन्हें भी उचित अवसर मिलना चाहिए।
हालांकि, जयपुर में उपलब्ध सीमित आवासीय संसाधनों और स्थानीय पत्रकारों की जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा। राजधानी में लंबे समय से काम कर रहे पत्रकारों की आवासीय आवश्यकताएं अलग हो सकती हैं। इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिससे प्रदेश के दूसरे हिस्सों के पत्रकारों को अवसर देने के साथ जयपुर के पात्र पत्रकारों के हित भी सुरक्षित रहें।
इसके लिए सरकार दो स्तरों पर योजना बना सकती है। पहला, जयपुर में उपलब्ध फ्लैटों के आवंटन में स्पष्ट और पारदर्शी पात्रता मानदंड तय किए जाएं। दूसरा, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर और अन्य शहरों में पत्रकारों की जरूरत के अनुसार अलग आवासीय योजनाओं की संभावनाएं तलाशी जाएं।
इससे आवास के अवसरों का विस्तार भी हो सकेगा और किसी एक शहर के सीमित संसाधनों पर पूरा भार डालने की स्थिति भी नहीं बनेगी।
पत्रकारों को मकान का सपना नहीं, खरीदने योग्य विकल्प चाहिए
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के सामने मूल प्रश्न यही है कि पत्रकारों के लिए घोषित या प्रस्तावित आवासीय योजना कितनी किफायती और कितनी व्यावहारिक होगी? यदि फ्लैटों की कीमत अधिकांश पात्र पत्रकारों की आर्थिक क्षमता से अधिक है, तो केवल योजना की घोषणा को उसकी सफलता नहीं माना जा सकता।
पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में विधायकों को रियायती दरों पर फ्लैट और पत्रकारों को कम कीमत पर जमीन उपलब्ध कराने के उदाहरणों की निष्पक्ष समीक्षा की जानी चाहिए। साथ ही, संबंधित कीमतों, आवंटन की शर्तों और सरकारी रियायतों की आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए, ताकि तुलना तथ्यों के आधार पर हो सके।
मुख्यमंत्री से अपेक्षा है कि वे पत्रकारों के आवास के मुद्दे को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक वास्तविक सामाजिक और आर्थिक जरूरत के रूप में देखें। पत्रकार लोकतंत्र में जनता की समस्याओं, सरकारी योजनाओं और व्यवस्था की जवाबदेही को सामने लाने का काम करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उनके लिए किसी भी कीमत पर विशेष सुविधा अनिवार्य है, लेकिन यदि सरकार उनके लिए आवास योजना बना रही है, तो उसकी शर्तें घोषित उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।
आखिरकार, किसी भी आवासीय योजना की असली उपलब्धि फ्लैटों की संख्या या उद्घाटन समारोह से नहीं मापी जाती। उसकी सफलता इस बात में है कि कितने पात्र परिवार अपने बजट के भीतर घर खरीद सके और कितने लोगों को स्थायी आवास की सुरक्षा मिली।
पत्रकारों को महंगे फ्लैटों का विकल्प देना पर्याप्त नहीं है; उन्हें अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप घर खरीदने का अवसर देना जरूरी है। अब सरकार को यह बताना चाहिए कि वह इस दिशा में कौन-से ठोस कदम उठाने जा रही है।
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