
MBBS की राजस्थान में 1,039 सीटें खाली, NEET काउंसलिंग के नए नियमों से बढ़ा विवाद…
राजस्थान के 15 निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की 1,039 सीटें खाली रहने का दावा
NEET UG 2026 की तीसरे राउंड की काउंसलिंग के नियमों में बदलाव से विवाद
दूसरे राज्यों के आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को राजस्थान की आरक्षण छूट का लाभ नहीं मिलेगा
सामान्य वर्ग की न्यूनतम NEET कटऑफ 213
निजी कॉलेजों ने नियमों में बदलाव की मांग करते हुए काउंसलिंग बोर्ड को ज्ञापन दिया
नवीन सक्सेना
जयपुर, dusrikhabar.com। एक तरफ मेडिकल कॉलेज में दाखिले का सपना देख रहे हजारों विद्यार्थी हैं, वहीं दूसरी तरफ राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की 1,039 सीटें खाली रह गई हैं। सत्र 2026-27 की तीसरे राउंड की काउंसलिंग के बाद सामने आई इस स्थिति ने मेडिकल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
निजी मेडिकल कॉलेज इसके लिए काउंसलिंग के बदले नियमों को जिम्मेदार बता रहे हैं, जबकि काउंसलिंग बोर्ड का कहना है कि सीटों का आवंटन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और राजस्थान की आरक्षण नीति के अनुरूप किया गया है।
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तीसरे राउंड के नियमों में क्या बदला?
राजस्थान में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की 85 प्रतिशत राज्य कोटे की सीटों और निजी मेडिकल कॉलेजों की 100 प्रतिशत सीटों पर राज्य काउंसलिंग बोर्ड के माध्यम से प्रवेश प्रक्रिया संचालित होती है। पहले और दूसरे राउंड में मुख्य रूप से राजस्थान के मूल निवासी अभ्यर्थियों को मौका मिलता है। तीसरे राउंड में राज्य की मेरिट सूची के बाद बची सीटों पर दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों को भी अवसर दिया जाता है।
विवाद की वजह सत्र 2026-27 के सूचना बुलेटिन के क्लॉज XI में किया गया बदलाव है। नए प्रावधान के अनुसार, दूसरे राज्यों के आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को राजस्थान की आरक्षण छूट का लाभ नहीं मिलेगा। उन्हें बची हुई सीटों पर सामान्य वर्ग के निर्धारित न्यूनतम NEET कटऑफ के आधार पर ही प्रवेश के लिए विचार किया जाएगा। इस साल सामान्य वर्ग की न्यूनतम कटऑफ 213 अंक बताई गई है।
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निजी कॉलेजों को आर्थिक नुकसान की चिंता
तीसरे राउंड के बाद प्रदेश के 15 निजी मेडिकल कॉलेजों में 1,039 MBBS सीटें खाली रहने से विवाद गहरा गया है। निजी कॉलेजों के प्रतिनिधियों और फेडरेशन ऑफ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजेज का कहना है कि संस्थानों ने अस्पतालों, आधुनिक सुविधाओं और मेडिकल शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर करोड़ों रुपये निवेश किए हैं। सीटें खाली रहने से आर्थिक नुकसान के साथ उपलब्ध शैक्षणिक संसाधनों का भी पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा।
कॉलेज प्रतिनिधियों ने काउंसलिंग बोर्ड को ज्ञापन देकर नियमों में बदलाव और केंद्रीय आरक्षण व्यवस्था के अनुरूप अवसर देने की मांग की है। उनका तर्क है कि मौजूदा प्रावधानों से दूसरे राज्यों के कई अभ्यर्थियों के प्रवेश के अवसर सीमित हो गए हैं।
काउंसलिंग बोर्ड ने अदालतों के आदेशों का दिया हवाला
काउंसलिंग बोर्ड के चेयरमैन डॉ. बी.एल. कुमावत के अनुसार, प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव कानूनी प्रावधानों और न्यायालयों के आदेशों को ध्यान में रखकर किया गया है। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के 9 सितंबर 2025 और 6 जनवरी 2026 के फैसलों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट के 13 अप्रैल 2026 के आदेश का हवाला दिया है।
बोर्ड का कहना है कि राजस्थान की आरक्षण नीति का लाभ राज्य के पात्र मूल निवासी अभ्यर्थियों को ही मिल सकता है। दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों को राजस्थान में प्रवेश के लिए सामान्य वर्ग की निर्धारित न्यूनतम पात्रता पूरी करनी होगी। बोर्ड ने यह भी तर्क दिया है कि दूसरे राज्यों में भी बाहरी विद्यार्थियों के प्रवेश को लेकर अलग-अलग नियम लागू हैं।
विद्यार्थियों के भविष्य और खाली सीटों पर सवाल
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि खाली सीटों का समाधान कैसे निकलेगा। एक ओर कॉलेजों को वित्तीय नुकसान की चिंता है, तो दूसरी ओर विद्यार्थियों के लिए मेडिकल शिक्षा के अवसर और प्रवेश नियमों की स्पष्टता अहम है।
अब नजर इस बात पर है कि काउंसलिंग बोर्ड और निजी मेडिकल कॉलेजों के बीच सहमति बनती है या नहीं। किसी भी समाधान में अदालतों के निर्देशों, आरक्षण नीति और योग्य अभ्यर्थियों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा।
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