
सिद्धारमैया की खामोशी के कर्नाटक की राजनीति गर्माई… कर्नाटक कांग्रेस में बदलते समीकरणों के बीच बढ़ी राजनीतिक हलचल
सिद्धारमैया की CLP बैठक से गैरमौजूदगी ने राजनीतिक चर्चा बढ़ाई
19 नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में भी वे नहीं हुए शामिल
2028 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर चुके हैं सिद्धारमैया
सिद्धारमैया के कई पुराने समर्थक नहीं बन पाए मंत्री
कैबिनेट विस्तार के बाद परिवारवाद और राजनीतिक विरासत पर बहस तेज हुई
डीके शिवकुमार ने सार्वजनिक रूप से टकराव की स्थिति को टाला
जमीर अहमद खान की कैबिनेट में वापसी ने पुराने गुटीय समीकरणों पर उठाए सवाल
फिलहाल सिद्धारमैया की ओर से खुले विरोध या बगावत का नहीं कोई स्पष्ट संकेत
विजय श्रीवास्तव,
बेंगलुरु,dusrikhabar.com। कर्नाटक कांग्रेस की राजनीति में इस समय सिद्धारमैया के बयान से ज्यादा उनकी गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बन गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य सिद्धारमैया का लगातार कुछ अहम पार्टी कार्यक्रमों से दूर रहना ऐसे समय में हुआ है, जब राज्य कांग्रेस में नेतृत्व, कैबिनेट और 2028 की चुनावी राजनीति को लेकर नए समीकरण बन रहे हैं।
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की अध्यक्षता में हुई कांग्रेस विधायक दल की बैठक में सिद्धारमैया शामिल नहीं हुए। इससे पहले 3 अगस्त को 19 नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में भी उनकी मौजूदगी नहीं थी। विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन भी वे सदन में नहीं पहुंचे और अगले दिन विधानसभा आए।इन घटनाओं ने कांग्रेस के भीतर सवाल खड़ा किया है कि क्या यह महज व्यस्तता और संयोग है या सिद्धारमैया अपनी राजनीतिक भूमिका को नए सिरे से तय कर रहे हैं? हालांकि, इसे सीधे असंतोष या बगावत कहना अभी जल्दबाजी होगी।
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2028 से दूरी के ऐलान के बाद क्यों बढ़ी चर्चा?
सिद्धारमैया पहले ही कह चुके हैं कि वे 2028 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। चुनाव में बढ़ते धनबल पर उनकी टिप्पणी को भी कर्नाटक कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जोड़कर देखा गया। उनके इस ऐलान के बाद स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठने लगा कि आने वाले वर्षों में कांग्रेस की सत्ता की राजनीति में सिद्धारमैया की भूमिका क्या होगी।
इसी बीच कैबिनेट विस्तार में सामने आए समीकरणों ने चर्चा को और गहरा कर दिया। उनके बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को कैबिनेट में जगह मिली, जबकि सिद्धारमैया के साथ लंबे समय से जुड़े कई वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिल सका।
बेटे को जगह, पुराने साथियों को इंतजार
कैबिनेट विस्तार के बाद कांग्रेस के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा यतींद्र सिद्धारमैया की एंट्री और सिद्धारमैया के पुराने समर्थकों के बाहर रहने को लेकर हुई। एचसी महादेवप्पा, केएन राजन्ना, एचके पाटिल, अशोक पाटण, आरबी तिम्मापुर, तनवीर सैत, शिवानंद पाटिल और के. वेंकटेश जैसे कई वरिष्ठ नेताओं को इस बार कैबिनेट में जगह नहीं मिली। इसके उलट यतींद्र को सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका मिलने से पार्टी के भीतर राजनीतिक विरासत और परिवारवाद को लेकर सवाल उठने लगे।
हालांकि, यतींद्र के समर्थक इसे अलग नजरिए से देखते हैं। उनके मुताबिक उनका प्रतिनिधित्व कुरुबा समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी से भी जुड़ा है। इसलिए पूरे घटनाक्रम को केवल परिवारवाद के रूप में देखना तस्वीर का एक ही पक्ष होगा।
वंशवाद के विरोध की राजनीति पर उठे सवाल
सिद्धारमैया ने अपने लंबे राजनीतिक सफर में वंशवाद की राजनीति की आलोचना की है। ऐसे में जब उनके बेटे को कैबिनेट में जगह मिली और उनके कई पुराने सहयोगी बाहर रह गए, तो विरोधियों को राजनीतिक हमला करने का मौका मिल गया। कांग्रेस के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या सिद्धारमैया की राजनीतिक विरासत अब उनके बेटे के माध्यम से आगे बढ़ रही है? दूसरी ओर, यह भी ध्यान रखना होगा कि मंत्रिमंडल में सीमित पदों के मुकाबले दावेदारों की संख्या कहीं अधिक होती है। ऐसे में हर कैबिनेट विस्तार के बाद कुछ नेताओं और उनके समर्थकों में असंतोष पैदा होना असामान्य नहीं है।
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डीके शिवकुमार ने संभाला संतुलन
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया के साथ किसी सार्वजनिक टकराव की तस्वीर बनने नहीं दी है। शिवकुमार महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों में सिद्धारमैया से सलाह लेते रहे हैं और यतींद्र की भूमिका को लेकर भी सकारात्मक नजरिया दिखाया है। उन्होंने यतींद्र को सार्वजनिक रूप से “हीरो” तक कहा। यह संकेत देता है कि कांग्रेस नेतृत्व फिलहाल सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच संतुलन बनाए रखने के प्रयास में है। लेकिन कैबिनेट विस्तार के बाद सामने आए राजनीतिक समीकरणों ने यह जरूर दिखाया है कि सिद्धारमैया खेमे के सभी पुराने चेहरों को पहले जैसी जगह नहीं मिल पाई है।
जमीर अहमद की एंट्री ने भी बदला समीकरण
कैबिनेट विस्तार में बीजेड जमीर अहमद खान की वापसी भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कभी सिद्धारमैया के करीबी माने जाने वाले जमीर और पूर्व मुख्यमंत्री के बीच राजनीतिक मतभेदों की चर्चा भी सामने आती रही है। इसके बावजूद उन्हें कैबिनेट में जगह मिलना बताता है कि कर्नाटक कांग्रेस के पुराने गुटीय समीकरण अब स्थिर नहीं हैं। वहीं सतीश जारकीहोली जैसे नेताओं के कैबिनेट में नहीं होने और कुरुबा समुदाय से जुड़े प्रतिनिधित्व को लेकर भी पार्टी के भीतर अलग-अलग चर्चाएं हैं।
क्या कमजोर हो रहा है सिद्धारमैया का प्रभाव?
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या सिद्धारमैया का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है?
एक तरफ वे अभी भी कांग्रेस के सबसे बड़े और प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। दूसरी तरफ कैबिनेट विस्तार में उनके कई पुराने सहयोगियों को जगह नहीं मिलने और बेटे को महत्वपूर्ण भूमिका मिलने से उनके राजनीतिक खेमे की ताकत पर चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषक रवींद्र रेशमे के आकलन के मुताबिक, सिद्धारमैया की छवि ऐसे वरिष्ठ नेता की रही है जिन्होंने कांग्रेस हाईकमान के फैसलों को स्वीकार किया। लेकिन बेटे को प्राथमिकता मिलने की धारणा से उनके पुराने समर्थक वर्ग और AHINDA आधार पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि, यह फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण है। सिद्धारमैया ने स्वयं अपनी गैरमौजूदगी को किसी राजनीतिक विरोध या असंतोष से नहीं जोड़ा है।
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AHINDA आधार क्यों है महत्वपूर्ण?
सिद्धारमैया की राजनीति को समझने में AHINDA—अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित सामाजिक गठजोड़— को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी सामाजिक आधार ने उन्हें कर्नाटक की राजनीति में अलग पहचान दिलाई है। इसलिए उनके खेमे के नेताओं की स्थिति और अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधित्व को लेकर होने वाली हर राजनीतिक हलचल का असर केवल कांग्रेस संगठन तक सीमित नहीं माना जाता। यतींद्र को मिली भूमिका और पुराने समर्थकों की स्थिति इसी व्यापक सामाजिक-राजनीतिक समीकरण के संदर्भ में भी देखी जा रही है।
अभी टकराव नहीं, लेकिन संकेतों को नजरअंदाज करना भी मुश्किल
फिलहाल कांग्रेस में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच खुले टकराव के कोई स्पष्ट संकेत नहीं हैं। लेकिन लगातार महत्वपूर्ण मौकों पर सिद्धारमैया की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक चर्चाओं को जरूर जन्म दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सिद्धारमैया पार्टी संगठन, सरकार और 2028 की चुनावी रणनीति में किस भूमिका में नजर आते हैं। उनकी खामोशी को फिलहाल न तो बगावत कहा जा सकता है और न ही महज संयोग। लेकिन कर्नाटक कांग्रेस में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच यह खामोशी निश्चित रूप से ऐसी कहानी कह रही है, जिसके अगले अध्याय पर राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी।
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