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जब मानसून के रंग में रंग जाता है जयपुर, तीज बन जाती है राजस्थान की जीवंत संस्कृति का उत्सव

जब मानसून के रंग में रंग जाता है जयपुर, तीज बन जाती है राजस्थान की जीवंत संस्कृति का उत्सव

शाही परंपरा, लोक संस्कृति और मानसून का अनूठा संगम है जयपुर की तीज

तीज माता की सवारी से गुलाबी नगरी में दिखती है राजस्थान की जीवंत विरासत

सिटी पैलेस से त्रिपोलिया बाजार, छोटी चौपड़ और गणगौरी बाजार होकर गुजरती है तीज माता की सवारी

चरी, चकरी, कच्छी घोड़ी, घूमर और कालबेलिया जैसे लोक नृत्य उत्सव की बढ़ाते हैं शोभा

राजस्थान की सांस्कृतिक एवं खान-पान परंपरा को दर्शाता है तीज और घेवर का रिश्ता

जयपुर,dusrikhabar.com। राजस्थान में मानसून की पहली बूंदें सिर्फ गर्मी से राहत नहीं देतीं, वे पूरे प्रदेश में एक नई ऊर्जा भर देती हैं। जयपुर की गुलाबी इमारतों पर जब काले बादल छाने लगते हैं, तो शहर का रंग-रूप भी बदलने लगता है। पहली फुहार से भीगी मिट्टी की खुशबू हवा में घुलती है, बाजारों में हरे और गुलाबी रंग की लहरिया साड़ियां नजर आने लगती हैं और ताजा बने घेवर की मिठास भरी खुशबू गलियों तक पहुंचती है।

ढोल-नगाड़ों, लोकगीतों और उल्लास के बीच राजस्थान के सबसे प्रिय त्योहारों में से एक तीज का आगमन होता है। यह ऐसा पर्व है, जिसमें आस्था, प्रेम, मानसून, लोक संस्कृति और राजसी परंपरा एक साथ दिखाई देती है।

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तीज की कहानी प्रेम, आस्था और तपस्या की कहानी

तीज की कहानी सबसे पहले प्रेम और अटूट विश्वास की कहानी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए 108 जन्मों तक कठोर तपस्या की। उनकी अटूट श्रद्धा और तपस्या के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपनी जीवनसंगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी मान्यता के कारण तीज आज भी विश्वास, धैर्य, समर्पण और अटूट प्रेम का प्रतीक मानी जाती है।

आज महिलाएं तीज के अवसर पर व्रत रखती हैं, तीज माता की पूजा करती हैं और पारंपरिक परिधानों में सजती हैं। गीत, झूले, मेहंदी और सखियों से मिलना-जुलना इस पर्व को महिलाओं के लिए विशेष बना देता है। लेकिन तीज केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है। यह राजस्थान में मानसून के स्वागत का उत्सव भी है।

मानसून आते ही झूलों और लोकगीतों से गूंजता राजस्थान

राजस्थान के गांवों और शहरों में मानसून के साथ पेड़ों पर सजे झूले दिखाई देने लगते हैं। लहरिया साड़ियों में सजी महिलाएं बारिश की ठंडी हवा के बीच झूले झूलती हैं। कहीं लोकगीत गूंजते हैं तो कहीं मेहंदी से सजे हाथ और हंसी-ठिठोली त्योहार का माहौल बना देते हैं।

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तीज इस मायने में भी खास है कि यह परिवार, दोस्ती, मिलन और नई शुरुआत का उत्सव बन जाता है। मानसून की हरियाली और बारिश की ठंडक के बीच लोक जीवन में उमंग और उत्साह की नई लहर दिखाई देती है।

जयपुर में तीज का दिखता है शाही रंग

हालांकि तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को पूरे राजस्थान में हर्षोल्लास से मनाई जाती है, लेकिन इसका सबसे भव्य और आकर्षक स्वरूप जयपुर में देखने को मिलता है। मान्यता है कि तीज से त्योहारों का सिलसिला शुरू होता है, जिसका छह माह बाद गणगौर के साथ समापन होता है। जयपुर में तीज की भव्य शोभायात्रा दो दिनों—3 और 4 तारीख—तक लगातार निकाली जाती है। इन दो दिनों में गुलाबी नगरी मानो एक विशाल सांस्कृतिक मंच में बदल जाती है।

ऐतिहासिक सिटी पैलेस से तीज माता की सवारी शाही अंदाज में निकलती है। सजे हुए ऊंट और घोड़े, पारंपरिक रथ, पालकियां, बैलगाड़ियां और रंग-बिरंगे लोक कलाकार इस शोभायात्रा का हिस्सा बनते हैं।

जब मानसून के रंग में रंग जाता है जयपुर, तीज बन जाती है राजस्थान की जीवंत संस्कृति का उत्सव

जयपुर में तीज माता की सवारी के समय नृत्य करते कलाकार और उमड़ी भीड़

लोक कलाओं की रंगीन प्रस्तुति

तीज की सवारी में राजस्थान की समृद्ध लोक कलाओं की झलक भी देखने को मिलती है। चरी नृत्य, चकरी, कच्छी घोड़ी, घूमर, कालबेलिया, चंग और धफ जैसे लोक नृत्य और संगीत इस आयोजन को और जीवंत बना देते हैं।

यह सवारी त्रिपोलिया बाजार और छोटी चौपड़ से गुजरते हुए गणगौरी बाजार के रास्ते पुंडरीक पार्क तक पहुंचती है। शोभायात्रा के दोनों ओर उमड़ी भीड़ के बीच संगीत, नृत्य, लोक कला, रंग और आस्था का ऐसा संगम दिखाई देता है, जिसमें राजस्थान की शाही विरासत और लोक संस्कृति एक साथ जीवंत हो उठती हैं।

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तीज और घेवर का रिश्ता भी है खास

तीज की बात हो और घेवर का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। बारिश के मौसम की यह खास मिठाई भी तीज के इंतजार का हिस्सा बन जाती है। जालीदार बनावट वाला घेवर, चाशनी में डूबा हुआ और मलाई या मेवों से सजा हुआ, तीज के उत्सव का स्वाद बन जाता है। घरों में घेवर बनाया जाता है और बाजारों से भी खरीदा जाता है। फिर परिवार और मेहमानों के साथ मिलकर इसका आनंद लिया जाता है। इस तरह तीज केवल आंखों का उत्सव नहीं, बल्कि स्वाद और खुशबू का भी उत्सव बन जाती है।

पर्यटकों के लिए तीज राजस्थान की जीवंत संस्कृति से जुड़ने का अवसर

राजस्थान आने वाले पर्यटकों के लिए तीज केवल देखने वाला उत्सव नहीं है। यह राजस्थान की जीवंत संस्कृति का हिस्सा बनने का अवसर है। यहां पौराणिक कथाएं शाही परंपराओं से मिलती हैं, मानसून उत्सव का रूप लेता है और हर रंग, हर गीत तथा हर रस्म अपने भीतर सदियों पुरानी कहानी समेटे रहती है।

तीज में राजस्थान को केवल देखा नहीं महसूस किया जाता है, पर्यटकों के लिए विशेष व्यवस्था

जयपुर की गलियों में बारिश की बूंदें पड़ती हैं, महलों और हवेलियों की सुंदरता निखरती है, बाजार रंगीन हो जाते हैं और लोक कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से शहर को उत्सव में बदल देते हैं। तीज की शोभायात्रा को देखने आने वाले पर्यटकों के लिए त्रिपोलिया गेट के सामने हिंद होटल में निःशुल्क बैठने की व्यवस्था की जाती है। इससे देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आराम से तीज की शाही सवारी और लोक संस्कृति के इस भव्य आयोजन का आनंद ले सकते हैं।

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मानसून सिर्फ मौसम नहीं, राजस्थान में जीवन की नई लय है

राजस्थान में मानसून सिर्फ मौसम नहीं बदलता। वह जीवन की लय बदल देता है। बारिश की बूंदों के साथ खेतों में उम्मीद जागती है, पेड़ों पर झूले पड़ते हैं, लोकगीतों की आवाज तेज होती है और त्योहारों का रंग गहरा हो जाता है और उस बदली हुई लय का सबसे खूबसूरत उत्सव है—तीज।

यह पर्व राजस्थान की उस सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है, जहां प्रेम और आस्था के साथ प्रकृति, लोक परंपरा, संगीत, नृत्य, स्वाद और शाही विरासत एक ही रंग में रंग जाते हैं। यही वजह है कि जब जयपुर मानसून में भीगता है, तो केवल गुलाबी नगरी नहीं बदलती—पूरा शहर तीज के रंग में झूम उठता है।

लेखक: दलीप सिंह राठौड़, संयुक्त निदेशक, पर्यटन विभाग, जयपुर

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