
तोप-बंदूकों की होली: 451 साल पुरानी वीरता परंपरा 4 मार्च को फिर होगी जीवंत
जमराबीज पर रणभूमि में बदलेगा ओंकारेश्वर चौक
मुगल चौकी ध्वस्त करने की ऐतिहासिक गाथा से जुड़ी परंपरा
मेवाड़ सहित मध्यप्रदेश से उमड़ेगा जनसैलाब
विजय श्रीवास्तव,
dusrikhabar.com। राजस्थान अपनी अनूठी परंपराओं के लिए दुनियाभर में पहचान रखता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यहां एक ऐसा गांव भी है जहां होली रंगों से नहीं, बल्कि तोप-बंदूकों की गर्जना से खेली जाती है? उदयपुर जिले के मेनार में इस वर्ष 4 मार्च को मेनार की बारूद वाली होली का भव्य आयोजन होगा। जमराबीज के अवसर पर यहां का ओंकारेश्वर चौक आधी रात को रणभूमि का दृश्य प्रस्तुत करता है, जहां पारंपरिक वेशभूषा में ग्रामीण शौर्य और इतिहास की याद को जीवंत करते हैं।
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रणभूमि में बदल जाता है शहर का एक हिस्सा, सैनिक छावनी जैसा माहौल
4 मार्च को मनाई जाने वाली जमराबीज के दिन मेनार गांव का वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। आधी रात के बाद ओंकारेश्वर चौक में गरजती तोपें, दनदनाती बंदूकें, हाथों में लहराती तलवारें और आसमान को रोशन करती आतिशबाजी पूरे क्षेत्र को रोमांचित कर देती है।
धोती-कुर्ता और रंग-बिरंगी पगड़ी पहने ग्रामीणों की टोलियां जोश के साथ आयोजन में शामिल होती हैं। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए मेवाड़ के उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, निंबाहेड़ा और मालवा क्षेत्र के साथ-साथ मध्यप्रदेश से भी हजारों लोग पहुंचते हैं।
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कैसे शुरु हुई 451 वर्षों से निभाई जा रही शौर्य परंपरा
करीब 451 साल से बारूद की होली मुगल चौकी ध्वस्त करने की ऐतिहासिक जीत की स्मृति में खेली जा रही है। बताया जाता है कि 1576 के हल्दीघाटी युद्ध के बाद मेवाड़ में राष्ट्रभक्ति की लहर उठी। मुगलों की एक प्रमुख चौकी वल्लभगढ़ (वर्तमान वल्लभनगर) में थी, जिसकी उपचौकी मेनार में स्थापित थी।

महाराणा प्रताप के निधन के बाद मुगल अत्याचारों से परेशान मेनारिया ब्राह्मणों ने रणनीति बनाई। विक्रम संवत 1657 (सन 1600) चैत्र सुदी द्वितीया, यानी होली के दूसरे दिन जमराबीज पर मेनारिया वीरों ने हमला कर मुगल चौकी को नष्ट कर दिया।
ठाकुर की पदवी और मेनारिया ब्राह्मणों को 17वीं उमराव का खिताब
इस वीरता से प्रसन्न होकर महाराणा अमर सिंह प्रथम ने मेनारिया समाज को शाही लाल जाजम, रणबांकुरा ढोल, सिर पर कलंगी धारण करने का अधिकार, ‘ठाकुर’ की पदवी और मेवाड़ की 17वीं उमराव की उपाधि प्रदान की। साथ ही 52 हजार बीघा जमीन पर लगान माफी की घोषणा की गई।
आज भी इस ऐतिहासिक जीत की याद में तोप-बंदूकों की होली खेली जाती है। शाम 5 से 8 बजे तक घरों में व्यंजन बनते हैं, मेहमाननवाजी होती है और फिर आधी रात को इतिहास का पुनर्जीवन होता है।
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