राजस्थान’ प्रदर्शनी जयपुर में शुरू, दुर्लभ अभिलेख पहली बार आमजन के लिए प्रदर्शित

राजस्थान’ प्रदर्शनी जयपुर में शुरू, दुर्लभ अभिलेख पहली बार आमजन के लिए प्रदर्शित

‘भारत की विश्व विरासत: राजस्थान’ प्रदर्शनी की शुरुआत

राष्ट्रीय अभिलेखागार की अनूठी पहल, विश्व धरोहर स्थलों के प्रमाणिक दस्तावेज एक मंच पर

पहाड़ी दुर्गों से जंतर मंतर तक—इतिहास के दुर्लभ रिकॉर्ड बने आकर्षण

संरक्षण, डिजिटलीकरण और पर्यटन पहचान को नई मजबूती

नवीन सक्सेना,

जयपुर,duarikhabar.com। “जहां हर पत्थर एक कहानी कहता है और हर सुर में परंपरा गूंजती है”—इसी भाव को साकार करती भारत की विश्व विरासत: राजस्थान प्रदर्शनी का शुभारंभ जयपुर स्थित जवाहर कला केन्द्र में किया गया। राष्ट्रीय अभिलेखागार की इस विशेष पहल के माध्यम से राजस्थान के विश्व धरोहर स्थलों से जुड़े दुर्लभ अभिलेख, ऐतिहासिक दस्तावेज और प्राचीन छायाचित्र पहली बार आमजन के लिए प्रदर्शित किए गए हैं। यह प्रदर्शनी न केवल सांस्कृतिक विरासत को सामने लाती है, बल्कि संरक्षण और जन-जागरूकता का सशक्त संदेश भी देती है।

भव्य उद्घाटन, प्रशासनिक और सांस्कृतिक जगत की उपस्थिति

प्रदर्शनी का उद्घाटन राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास, अतिरिक्त मुख्य सचिव प्रवीण गुप्ता और राष्ट्रीय अभिलेखागार के महानिदेशक संजय रस्तोगी ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, इतिहासकार, शोधार्थी और संस्कृति जगत से जुड़े गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि राजस्थान की विश्व धरोहर केवल स्थापत्य संरचनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे जुड़े अभिलेख, पांडुलिपियां और प्रशासनिक दस्तावेज भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

पहाड़ी दुर्गों से लेकर जंतर मंतर तक—इतिहास की प्रमाणिक झलक

प्रदर्शनी में ‘राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग’ समूह के अंतर्गत आमेर, चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथम्भौर, गागरोन और जैसलमेर दुर्ग से संबंधित प्रमाणिक शासकीय अभिलेख प्रदर्शित किए गए हैं।

इसके अतिरिक्त: जंतर मंतर, जयपुर और केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज, मानचित्र और संरक्षण संबंधी आदेश भी प्रदर्शनी का हिस्सा हैं।

इन अभिलेखों के माध्यम से न केवल स्थापत्य कला, बल्कि राजकीय प्रशासन, सैन्य संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रामाणिक इतिहास सामने आता है।

दुर्लभ पांडुलिपियां और श्वेत-श्याम छायाचित्र आकर्षण का केंद्र

प्रदर्शनी में 19वीं और 20वीं सदी के प्रारंभिक काल के शासकीय रिकॉर्ड, फारसी और राजस्थानी पांडुलिपियां तथा संरक्षण से जुड़े प्रशासनिक आदेश प्रमुख आकर्षण हैं।

ये दस्तावेज दर्शाते हैं कि विश्व धरोहर संरक्षण केवल स्मारकों की मरम्मत तक सीमित नहीं, बल्कि उससे जुड़े दस्तावेजों के सुरक्षित संधारण और डिजिटलीकरण से भी जुड़ा है।

संरक्षण और डिजिटलीकरण पर सरकार की प्रतिबद्धता

अतिरिक्त मुख्य सचिव प्रवीण गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि राजस्थान की पहचान उसके दुर्गों और महलों के साथ-साथ लोकधुनों और मरुस्थलीय संस्कृति में भी निहित है। उन्होंने अभिलेखों के संरक्षण और डिजिटलीकरण को समय की आवश्यकता बताया।

राष्ट्रीय अभिलेखागार के महानिदेशक संजय रस्तोगी ने कहा कि इस प्रदर्शनी का उद्देश्य युवाओं और शोधार्थियों में सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

पर्यटन और वैश्विक पहचान को मिलेगा बल

पर्यटन विभाग के संयुक्त निदेशक दलीप सिंह राठौड़ ने कहा कि यह प्रदर्शनी राजस्थान की सांस्कृतिक और वैश्विक पहचान को सुदृढ़ करेगी।

उनके अनुसार राजस्थान पर्यटन केवल ऐतिहासिक स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि शोध और सांस्कृतिक अध्ययन के लिए भी राज्य को प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करता है।

‘भारत की विश्व विरासत: राजस्थान’ प्रदर्शनी यह स्पष्ट संदेश देती है कि संरक्षण केवल संरचनाओं का ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी स्मृतियों, दस्तावेजों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का भी होना चाहिए।

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