‘दो अकेली’: स्त्री संवेदना और संबल की सजीव कहानी

‘दो अकेली’: स्त्री संवेदना और संबल की सजीव कहानी

राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर के मंच पर उभरा स्त्री मन का अनकहा सच

इंडिया पिंक फेस्ट के तहत भावनाओं से भरी नाट्य प्रस्तुति

अकेलेपन, पीड़ा और आपसी सहारे की मार्मिक दास्तान

जयपुर,dusrikhabar.com। जयपुर। जब अकेलापन जीवन पर भारी पड़ने लगे और पीड़ा शब्दों से परे हो जाए, तब रंगमंच संवेदनाओं की सबसे सशक्त आवाज बनता है। जयपुर स्थित राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (RIC) के मंच पर शुक्रवार को मंचित नाटक ‘दो अकेली’ ने कुछ ऐसा ही गहरा और भावनात्मक अनुभव दर्शकों के सामने रखा।

बबिता मदान के निर्देशन में प्रस्तुत यह नाटक दो ऐसी महिलाओं की कहानी कहता है, जो परिस्थितियों की मार से भीतर तक टूट चुकी हैं और समाज की भीड़ में रहते हुए भी बेहद अकेली हैं, लेकिन एक-दूसरे के सहारे जीवन की जद्दोजहद करती हैं।

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स्त्री मन का सजीव दस्तावेज बना ‘दो अकेली’

आरआईसी के मंच पर प्रस्तुत ‘दो अकेली’ केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं रही, बल्कि यह स्त्री मन की गहराइयों, अनकहे दर्द और भावनात्मक रिक्तता का सजीव दस्तावेज बनकर उभरी। इंडिया पिंक फेस्ट के तहत आयोजित इस नाटक ने दर्शकों को स्त्री जीवन की उस सच्चाई से रूबरू कराया, जिसे समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है।

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संघर्ष से संबल तक की भावनात्मक यात्रा

नाटक की कथा दो अकेली और बेबस महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका जीवन निरंतर संघर्षों से भरा है। समाज, रिश्ते और परिस्थितियां उन्हें बार-बार तोड़ती हैं, लेकिन इन्हीं टूटनों के बीच दोनों एक-दूसरे में अपनापन, समझ और प्रेम तलाश लेती हैं। यह प्रेम किसी पारंपरिक परिभाषा में बंधा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दर्द को महसूस करने और मानवीय संबल बनने की भावना है।

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निर्देशन और अभिनय का संवेदनशील संगम

नाटक की निर्देशक बबिता मदान ने बताया कि यह प्रस्तुति सरताज माथुर की प्रेरणा से साकार हुई है। उनका कहना है कि दो अकेली महिलाओं के अंतरमन की दास्तां को मंच पर लाकर समाज के सामने रखना ही इस नाटक का मूल उद्देश्य है। नाटक में अहम भूमिका निभाने वाली संगीता गेरा ने इसे कला, साहित्य और अभिनय का त्रिवेणी संगम बताया।

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सशक्त अभिनय ने दर्शकों को झकझोरा

मंच पर संगीता गेरा और रूचि नरूला ने अपने सहज, सशक्त और संवेदनशील अभिनय से दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया। संवाद कम रहे, लेकिन भावनाओं की गूंज इतनी गहरी थी कि हर दृश्य जीवन के किसी अनकहे सच को उजागर करता नजर आया। थिएटर में मौजूद दर्शक पूरी तरह कथा में डूबे रहे और प्रस्तुति के समापन पर तालियों की गूंज देर तक सुनाई देती रही।

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स्त्री मन की चुप्पियों को आवाज देता नाटक

‘दो अकेली’ उन चुप्पियों को शब्द देता है, जिन्हें महिलाएं अक्सर भीतर ही भीतर सहती हैं। नाटक यह स्पष्ट करता है कि अकेलापन केवल साथ न होने से नहीं, बल्कि समझ और संवेदना के अभाव से जन्म लेता है। वहीं, जब दो टूटे हुए मन एक-दूसरे का सहारा बनते हैं, तो जीवन फिर से अर्थ और उम्मीद से भर उठता है।
यह नाट्य प्रस्तुति यह संदेश भी देती है कि प्रेम और समर्पण केवल रिश्तों के नामों में नहीं बंधे होते, बल्कि वे मानवीय संवेदना की सबसे शुद्ध अभिव्यक्ति हैं।

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