
कल से शुरू होंगे शारदीय नवरात्रि, जानें नौ देवियों की कथा, पूजा विधि और हर दिन का महत्व
शारदीय नवरात्रि रविवार, 11 अक्टूबर से, शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक नौ देवियों की पूजा
शुभ मुहूर्त सुबह 6:24 से 10:17 बजे, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:37 बजे
शक्ति, सदाचार, आत्मविश्वास, करुणा और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश
कलश स्थापना से लेकर नौ दिन तक देवियों की पूजा की विधि और उसका महत्व
विजय श्रीवास्तव, माही राठौड़
जयपुर, dusrikhabar.com। कल, रविवार 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ होगा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाले इस पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। घरों और मंदिरों में घट स्थापना, दीप प्रज्वलन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, व्रत और कन्या पूजन के माध्यम से भक्त मां की उपासना करेंगे। नवरात्रि का समापन नौ दिनों की आराधना के बाद विजयादशमी यानी दशहरे के पर्व के साथ 20 अक्टूबर को होगा।
नवरात्रि का संदेश केवल मनोकामनाएं मांगना नहीं, बल्कि अपने भीतर के भय, अहंकार, क्रोध और नकारात्मकता पर विजय पाना भी है। मां दुर्गा के नौ स्वरूप जीवन के अलग-अलग गुणों का प्रतीक माने जाते हैं—कहीं धैर्य और तपस्या, कहीं साहस और करुणा, तो कहीं ज्ञान और सिद्धि का संदेश मिलता है।
शारदीय नवरात्रि 2026: मां दुर्गा की आराधना, घट स्थापना की विधि और नौ देवियों की महिमा
नवरात्रि केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशक्ति, आस्था, संयम और नारी सम्मान का संदेश देने वाला उत्सव है। नौ दिनों तक मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की आराधना के माध्यम से भक्त अपने जीवन में साहस, ज्ञान, धैर्य, समृद्धि और सकारात्मकता की कामना करते हैं। घट स्थापना से शुरू होने वाली यह आध्यात्मिक यात्रा हमें यह भी याद दिलाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास और सद्कर्म का दीपक जलाए रखना चाहिए।

देशभर में 11 अक्टूबर को घट स्थापना का शुभ मुहूर्त
मां दुर्गा की आराधना का पावन पर्व शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू होगा। नवरात्रि के पहले दिन घरों और मंदिरों में घट स्थापना के साथ नौ दिवसीय पूजा-अर्चना का शुभारंभ होगा। इस दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी।
सुबह 6:24 से 10:17 बजे तक शुभ मुहूर्त
जयपुर में घट स्थापना का प्रमुख मुहूर्त सुबह 6:24 बजे से 10:17 बजे तक रहेगा। इस दौरान श्रद्धालु विधि-विधान से कलश स्थापना कर सकते हैं। यदि सुबह के मुहूर्त में स्थापना संभव नहीं हो, तो अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:37 बजे तक रहेगा।
घट स्थापना क्यों की जाती है? कलश में क्या है विशेष महत्व?
नवरात्रि के पहले दिन होने वाली घट स्थापना को कलश स्थापना भी कहा जाता है। इसे देवी शक्ति के आह्वान और नौ दिनों की पूजा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। कलश में जल, आम के पत्ते और नारियल रखने की परंपरा है। कई परिवार मिट्टी में जौ बोते हैं, जिन्हें नौ दिनों तक अंकुरित होते देखना शुभता, उर्वरता और नए जीवन का प्रतीक माना जाता है।
घट स्थापना का मानवीय और आध्यात्मिक संदेश: जिस तरह मिट्टी में बोया गया बीज धीरे-धीरे अंकुरित होता है, उसी तरह मनुष्य के भीतर सद्भाव, धैर्य और अच्छे विचार भी निरंतर अभ्यास से विकसित होते हैं।
घट स्थापना की पूजा विधि: घर पर कैसे करें पूजा?
घट स्थापना की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है। सामान्य रूप से पूजा इन चरणों में की जाती है:
- पूजा स्थल की सफाई: घर के मंदिर या पूजा के स्थान को साफ करके चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
- मिट्टी और जौ की व्यवस्था: स्वच्छ पात्र में मिट्टी भरकर जौ बोएं। इसे नवरात्रि के दौरान नियमित रूप से पानी दें।
- कलश तैयार करें: कलश में स्वच्छ जल भरें। परंपरा के अनुसार सुपारी, अक्षत, सिक्का आदि डाल सकते हैं और उसके मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें।
- नारियल स्थापित करें: नारियल को लाल वस्त्र या मौली से सजाकर कलश के ऊपर रखें। कलश को मिट्टी या जौ वाले पात्र के पास स्थापित करें।
- मां दुर्गा का आह्वान: दीपक जलाकर गणेश जी का स्मरण करें और मां दुर्गा तथा प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा करें।
- संकल्प और मंत्र: परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि और मंगल की कामना के साथ पूजा का संकल्प लें। अपनी श्रद्धा के अनुसार दुर्गा मंत्र, दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
- भोग और आरती: फल, मिठाई, पुष्प और अन्य सात्त्विक प्रसाद अर्पित कर आरती करें।
ध्यान रखें: अखंड ज्योत जलाने पर उसकी सुरक्षा का पूरा प्रबंध होना चाहिए। व्रत रखना स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार ही उचित है; पूजा का महत्व केवल उपवास की कठोरता से नहीं, बल्कि श्रद्धा, सदाचार और सेवा भावना से भी जुड़ा है।
जयपुर में घट स्थापना का शुभ मुहूर्त
जयपुर के लिए उपलब्ध द्रिक पंचांग के अनुसार, 11 अक्टूबर को घट स्थापना का समय सुबह 6:24 बजे से 10:17 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:37 बजे तक बताया गया है। पंचांग में इस दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का उल्लेख भी है। इसलिए घट स्थापना के लिए अपने स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार योग्य पुरोहित से मुहूर्त की पुष्टि करना उचित रहेगा।

नवरात्रि क्या है और शारदीय नवरात्रि क्यों मनाई जाती है?
‘नवरात्रि’ दो शब्दों से मिलकर बना है—‘नव’ अर्थात नौ और ‘रात्रि’ अर्थात रातें। हिंदू परंपरा में वर्ष के दौरान चैत्र और शारदीय नवरात्रि विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। शारदीय नवरात्रि आश्विन मास में आती है और देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे विविध धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
मां दुर्गा को शक्ति, संरक्षण और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक परंपरा में उनकी उपासना से भक्त साहस, शांति, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा ने महिषासुर जैसे अत्याचारी असुर का वध कर दैवी शक्ति और धर्म की रक्षा की थी। यह कथा केवल एक युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और सत्य की विजय का प्रतीक है।
नवरात्रि में शक्ति की उपासना का अर्थ है यह स्वीकार करना कि जीवन में चुनौतियों का सामना करने के लिए केवल बाहरी साधनों की नहीं, बल्कि आंतरिक साहस, विवेक और धैर्य की भी आवश्यकता होती है।
नवरात्रि के नौ दिन, नौ देवियां: कथा, पूजा और महत्व
नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। हर स्वरूप का अपना धार्मिक आख्यान और प्रतीकात्मक संदेश है। नीचे 2026 के लिए प्रचलित दिनवार क्रम के अनुसार पूजा का विवरण दिया गया है।
नव दुर्गा: नौ स्वरूपों के नाम
-
मां शैलपुत्री — दृढ़ता और स्थिरता की प्रतीक।
-
मां ब्रह्मचारिणी — तपस्या, संयम और धैर्य की प्रतीक।
-
मां चंद्रघंटा — साहस और निर्भीकता की प्रतीक।
-
मां कूष्मांडा — सृजन और ऊर्जा की प्रतीक।
-
मां स्कंदमाता — मातृत्व और करुणा की प्रतीक।
-
मां कात्यायनी — पराक्रम और न्याय की प्रतीक।
-
मां कालरात्रि — भय पर विजय और संकट से रक्षा की प्रतीक।
-
मां महागौरी — शांति और निर्मलता की प्रतीक।
-
मां सिद्धिदात्री — ज्ञान, विवेक और सिद्धि की प्रतीक।

पहला दिन — 11 अक्टूबर: मां शैलपुत्री
स्वरूप और महत्व: मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप माना जाता है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल होता है तथा उनका वाहन वृषभ है।
कथा: पौराणिक परंपरा में शैलपुत्री को सती के पुनर्जन्म के रूप में माता पार्वती से जोड़ा जाता है। सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर देह त्याग दी थी। बाद में उन्होंने हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या की।
पूजा का महत्व: मां शैलपुत्री की पूजा जीवन में स्थिरता, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प का प्रतीक मानी जाती है। जैसे पर्वत विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहता है, वैसे ही मनुष्य को कठिन समय में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।
- पूजा का दिन: रविवार, 11 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: गाय का घी या घी से बना प्रसाद
- प्रतीकात्मक संदेश: मजबूत नींव और अडिग विश्वास

दूसरा दिन — 12 अक्टूबर: मां ब्रह्मचारिणी
स्वरूप और महत्व: मां ब्रह्मचारिणी तपस्या, साधना, संयम और समर्पण का प्रतीक हैं। उनके एक हाथ में जपमाला और दूसरे में कमंडल दिखाया जाता है।
कथा: धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। लंबे समय तक उन्होंने कठिन साधना और संयम का पालन किया। उनकी इसी तपस्विनी अवस्था को ब्रह्मचारिणी स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
पूजा का महत्व: यह स्वरूप सिखाता है कि जीवन में किसी लक्ष्य को पाने के लिए धैर्य, निरंतर प्रयास और आत्मानुशासन जरूरी हैं। सफलता का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति मनुष्य को आगे बढ़ाती है।
- पूजा का दिन: सोमवार, 12 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: शक्कर, मिश्री या फल
- प्रतीकात्मक संदेश: अनुशासन, धैर्य और साधना

तीसरा दिन — 13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा
स्वरूप और महत्व: मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित माना जाता है। उनका स्वरूप शौर्य, सजगता और दुष्ट शक्तियों से रक्षा का प्रतीक है।
कथा: पौराणिक चित्रणों में विवाह के बाद माता पार्वती का एक वीर और दिव्य स्वरूप सामने आता है। उनके मस्तक पर स्थित घंटे के आकार का चंद्रमा उन्हें चंद्रघंटा नाम देता है। मान्यता है कि देवी का यह रूप दुष्ट शक्तियों का सामना करने और भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट हुआ।
पूजा का महत्व: मां चंद्रघंटा की आराधना भय से मुक्ति और साहस की कामना से जुड़ी है। यह संदेश देती है कि शांति का अर्थ अन्याय के सामने चुप रहना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर निर्भीक होकर सही कदम उठाना भी है।
- पूजा का दिन: मंगलवार, 13 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: दूध या दूध से बनी मिठाई
- प्रतीकात्मक संदेश: साहस, सुरक्षा और निर्भीकता

चौथा दिन — 14 अक्टूबर: मां कूष्मांडा
स्वरूप और महत्व: मां कूष्मांडा को सृष्टि में ऊर्जा और प्रकाश का संचार करने वाली देवी माना जाता है। उनके आठ हाथों में विभिन्न दिव्य वस्तुएं और अस्त्र-शस्त्र दर्शाए जाते हैं।
कथा: धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब चारों ओर अंधकार था, तब मां कूष्मांडा की मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना हुई। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति और जीवन में ऊर्जा भरने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।
पूजा का महत्व: मां कूष्मांडा का स्वरूप सृजन, आशा और सकारात्मकता की याद दिलाता है। जीवन में निराशा का अंधकार कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी उम्मीद नई शुरुआत का आधार बन सकती है।
- पूजा का दिन: बुधवार, 14 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: मालपुआ या मीठा प्रसाद
- प्रतीकात्मक संदेश: सृजन, ऊर्जा और आशा

पांचवां दिन — 15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता
स्वरूप और महत्व: मां स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय यानी स्कंद की माता हैं। उन्हें बाल स्कंद को गोद में लिए हुए दिखाया जाता है। उनका स्वरूप मातृत्व, करुणा और संरक्षण का प्रतीक है।
कथा: पौराणिक परंपरा में भगवान कार्तिकेय को देवताओं की सेना का सेनापति माना जाता है। माता पार्वती का अपने पुत्र स्कंद के साथ दर्शाया गया रूप स्कंदमाता कहलाता है। यह स्वरूप मां के स्नेह और संतान की रक्षा के भाव को व्यक्त करता है।
पूजा का महत्व: स्कंदमाता की आराधना परिवार की सुख-शांति, संतान के कल्याण और मातृत्व के सम्मान की कामना से जुड़ी है। यह दिन याद दिलाता है कि बच्चों को सुरक्षा देने के साथ उन्हें अच्छे संस्कार, स्वतंत्र सोच और सही दिशा देना भी जरूरी है।
- पूजा का दिन: गुरुवार, 15 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: केला या केले से बना प्रसाद
- प्रतीकात्मक संदेश: मातृत्व, करुणा और संरक्षण

छठा दिन — 16 अक्टूबर: मां कात्यायनी
स्वरूप और महत्व: मां कात्यायनी को साहस, पराक्रम और अन्याय के विरोध की देवी माना जाता है। उनके स्वरूप में सिंह और अस्त्र-शस्त्र विशेष रूप से दर्शाए जाते हैं।
कथा: पौराणिक मान्यता के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने देवी की आराधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहां पुत्री रूप में जन्म लिया और कात्यायनी कहलाईं। महिषासुर के अत्याचारों का अंत करने वाली दुर्गा की कथा भी इस शक्ति स्वरूप से जुड़ी मानी जाती है।
पूजा का महत्व: मां कात्यायनी की पूजा मनोबल और बाधाओं का सामना करने की शक्ति के लिए की जाती है। उनका संदेश है कि जब अन्याय बढ़े तो समाज को साहस के साथ सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
- पूजा का दिन: शुक्रवार, 16 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: शहद या शहद से बना प्रसाद
- प्रतीकात्मक संदेश: न्याय, साहस और आत्मसम्मान

सातवां दिन — 17 अक्टूबर: मां कालरात्रि
स्वरूप और महत्व: मां कालरात्रि का स्वरूप उग्र है, लेकिन भक्तों के लिए उन्हें शुभ फल देने वाली और भय दूर करने वाली देवी माना जाता है। उन्हें अंधकार और दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक समझा जाता है।
कथा: देवी दुर्गा के युद्ध संबंधी आख्यानों में कालरात्रि वह शक्तिशाली रूप हैं जो दुष्ट शक्तियों का संहार करती हैं। उनका उग्र स्वरूप इस बात का संकेत है कि बुराई का सामना करने के लिए कभी-कभी दृढ़ और कठोर संकल्प की जरूरत होती है।
पूजा का महत्व: मां कालरात्रि की आराधना भय, असुरक्षा और नकारात्मकता से मुक्ति की कामना से की जाती है। उनका संदेश है कि डर से भागने के बजाय उसका सामना करना और कमजोर लोगों की रक्षा करना सच्ची शक्ति है।
- पूजा का दिन: शनिवार, 17 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: गुड़ या गुड़ से बना प्रसाद
- प्रतीकात्मक संदेश: भय पर विजय और संकट में साहस

आठवां दिन — 18 अक्टूबर: मां महागौरी
स्वरूप और महत्व: मां महागौरी को शांति, पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना जाता है। उनका स्वरूप सामान्यतः श्वेत वस्त्रों और शांत भाव के साथ चित्रित किया जाता है।
कथा: मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए लंबी और कठिन तपस्या की। तपस्या के कारण उनका शरीर धूल और धूप से प्रभावित हो गया। भगवान शिव की कृपा से उन्हें उज्ज्वल रूप प्राप्त हुआ, जिसके कारण वे महागौरी कहलाईं।
पूजा का महत्व: महागौरी की पूजा मन की शुद्धता, शांति और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की कामना से जुड़ी है। उनका संदेश है कि व्यक्ति अपनी गलतियों को स्वीकार कर, व्यवहार सुधारकर और दूसरों के प्रति करुणा रखकर नई शुरुआत कर सकता है।
- पूजा का दिन: रविवार, 18 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: नारियल या नारियल से बना प्रसाद
- प्रतीकात्मक संदेश: शांति, पवित्रता और आत्मसुधार

नौवां दिन — 19 अक्टूबर: मां सिद्धिदात्री
स्वरूप और महत्व: मां सिद्धिदात्री को सिद्धियों, ज्ञान और आध्यात्मिक पूर्णता प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। उन्हें कमल पर विराजमान और चार भुजाओं वाले स्वरूप में दर्शाया जाता है।
कथा: धार्मिक मान्यताओं में मां सिद्धिदात्री को वह शक्ति बताया गया है जो साधक को आध्यात्मिक उपलब्धियां और विवेक प्रदान करती है। कुछ परंपराओं में भगवान शिव द्वारा देवी की आराधना से अर्धनारीश्वर स्वरूप की प्राप्ति का प्रसंग भी उनसे जोड़ा जाता है।
पूजा का महत्व: सिद्धिदात्री की आराधना ज्ञान, विवेक और जीवन के उद्देश्य को समझने की कामना से की जाती है। यह स्वरूप सिखाता है कि वास्तविक उपलब्धि केवल धन या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि अपने ज्ञान का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करना भी है।
- पूजा का दिन: सोमवार, 19 अक्टूबर
- परंपरागत भोग: तिल या तिल से बना प्रसाद
- प्रतीकात्मक संदेश: ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक पूर्णता
ध्यान देने योग्य बात: देवी के भोग, मंत्र, रंग और पूजा की स्थानीय परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं। ऊपर दिए गए भोग प्रचलित धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं, कोई अनिवार्य नियम नहीं।
अष्टमी और नवमी का क्या है महत्व? कन्या पूजन क्यों किया जाता है?
नवरात्रि के अंतिम दिनों में दुर्गा अष्टमी और महानवमी का विशेष महत्व माना जाता है। इन दिनों अनेक परिवारों में कन्या पूजन, हवन और विशेष आरती की जाती है। कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर भोजन कराया जाता है तथा सामर्थ्य के अनुसार उपहार या दक्षिणा दी जाती है।

कन्या पूजन का वास्तविक संदेश केवल अनुष्ठान तक सीमित नहीं होना चाहिए। बेटियों को शिक्षा, सुरक्षा, समान अवसर और सम्मान देना भी देवी शक्ति के प्रति सच्ची श्रद्धा का हिस्सा है। जिस समाज में बालिकाओं को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, वहां नवरात्रि का संदेश जीवन में उतरता दिखाई देता है।
2026 में प्रचलित दिनवार क्रम के अनुसार 18 अक्टूबर को महागौरी पूजा और 19 अक्टूबर को सिद्धिदात्री पूजा है। अष्टमी-नवमी के अनुष्ठानों का सटीक समय स्थानीय पंचांग के अनुसार देखना चाहिए, क्योंकि तिथि और पूजा की परंपराओं में क्षेत्रीय अंतर हो सकता है।
नवरात्रि में व्रत रखने का क्या है महत्व?
नवरात्रि में कई भक्त नौ दिन व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग पहले और अंतिम दिन उपवास करते हैं। कुछ परिवार सात्त्विक भोजन के साथ पूजा करते हैं। व्रत का स्वरूप व्यक्ति की आस्था, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा पर निर्भर करता है।
धार्मिक मान्यता में व्रत को आत्मसंयम और साधना का माध्यम माना गया है। इसका व्यापक संदेश यह है कि व्यक्ति अपने विचारों, व्यवहार और इच्छाओं पर संतुलन रखना सीखे।
- सात्त्विक जीवनशैली: अपनी परंपरा के अनुसार सात्त्विक भोजन और नियमित पूजा।
- आत्मसंयम: क्रोध, कटु वचन और अनावश्यक विवादों से बचने का प्रयास।
- सेवा भावना: जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या यथासंभव सहायता देना।
- स्वास्थ्य का ध्यान: निर्जल या कठोर उपवास अपनी क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही करें।
मां दुर्गा की पूजा के साथ समाज को क्या संदेश देना चाहिए?
नवरात्रि में मंदिरों की सजावट, घरों में पूजा, गरबा, डांडिया और धार्मिक आयोजन वातावरण को उत्सवमय बनाते हैं। लेकिन इस पर्व की सार्थकता तब और बढ़ जाती है, जब भक्ति के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाई जाए।
मां दुर्गा के नौ स्वरूप हमें बताते हैं कि शक्ति के साथ करुणा, साहस के साथ विवेक और सफलता के साथ सेवा भावना भी जरूरी है। जरूरतमंद की मदद करना, महिलाओं का सम्मान करना, बच्चों की शिक्षा में सहयोग देना और प्रकृति की रक्षा करना भी सकारात्मक जीवन के महत्वपूर्ण संकल्प हो सकते हैं।
सच्ची आराधना वह है, जिसमें मंदिर में जलने वाले दीपक की रोशनी हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे। नवरात्रि का पर्व हमें अपने भीतर की कमजोरियों को पहचानने, अच्छे गुणों को अपनाने और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा देता है।
नवरात्रि 2026: दिनवार पूजा कैलेंडर
| तारीख | दिन | देवी का स्वरूप |
| 11 अक्टूबर | पहला दिन | मां शैलपुत्री |
| 12 अक्टूबर | दूसरा दिन | मां ब्रह्मचारिणी |
| 13 अक्टूबर | तीसरा दिन | मां चंद्रघंटा |
| 14 अक्टूबर | चौथा दिन | मां कूष्मांडा |
| 15 अक्टूबर | पांचवां दिन | मां स्कंदमाता |
| 16 अक्टूबर | छठा दिन | मां कात्यायनी |
| 17 अक्टूबर | सातवां दिन | मां कालरात्रि |
| 18 अक्टूबर | आठवां दिन | मां महागौरी |
| 19 अक्टूबर | नौवां दिन | मां सिद्धिदात्री |
| 20 अक्टूबर | विजयादशमी | दशहरा |
मां दुर्गा सभी के जीवन में सुख, शांति, सद्बुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करें। नवरात्रि का यह पर्व हर घर में खुशहाली और हर हृदय में सेवा, प्रेम तथा करुणा का भाव जगाए।
————————————
#Shardiya Navratri 2026, When does #Navratri start, #Ghat Sthapana Muhurta Jaipur, #Nine forms of Maa Durga, #Navdurga story, #Navratri worship method, #Kanya pujan, #Durga Ashtami, #Mahanavami, #Vijayadashami 2026, शारदीय नवरात्रि 2026, नवरात्रि कब से शुरू है, घट स्थापना मुहूर्त जयपुर, मां दुर्गा के नौ स्वरूप, नवदुर्गा की कथा, नवरात्रि पूजा विधि, कन्या पूजन, दुर्गा अष्टमी, महानवमी, विजयादशमी 2026
