
आखिर चंदा क्यों नहीं लेता आरएसएस, संघ में कैसे शुरु हुई गुुरुदक्षिणा की परंपरा?
आखिर चंदा क्यों नहीं लेता RSS, संघ में कैसे शुरु हुई गुुरुदक्षिणा की परंपरा?
संघ के 100 साल की यात्रा की कहानी
बाहरी लोगों से क्यों चंदा नहीं लेता संघ?
संघ में पहली बार कब शुरु हुई गुरुदक्षिणा की परंपरा, पढिए पूरी कहानी…
विजय श्रीवास्तव,
जयपुर,dusrikhabar.com। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने 100 वर्ष पूरे कर चुका है, लेकिन आज भी यह सवाल आम लोगों को सोचने पर मजबूर करता है कि संघ चंदा क्यों नहीं लेता? दुनिया के सबसे बड़े गैर-सरकारी संगठनों में गिने जाने के बावजूद, स्वयंसेवकों को चंदा मांगते कभी नहीं देखा जाता। इस विशेष श्रृंखला “संघ के 100 सालों की 100 कहानियाँ” में आज जानते हैं पहली गुरुदक्षिणा और संघ की अनूठी व्यवस्था के पीछे की पूरी कहानी।

चंदा नहीं, मन से दी गई गुरुदक्षिणा पर चलता है RSS
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे अनोखी परंपराओं में शामिल है—गुरुदक्षिणा। इतिहास के एक प्रसंग में, जब बालासाहब देवरस सरसंघचालक थे, तब आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि पथसंचलन के लिए एक साधारण बिगुल खरीदने तक के लिए धन नहीं था। तब देवरस, बाबा साहब आप्टे, दादा राव परमार्थ और कृष्णराव मुहर्रिर चार मील पैदल चलकर एक स्वयंसेवक के घर पहुँचे, जिसकी पिछली गुरुदक्षिणा नहीं आई थी। आवभगत समेत तीन घंटे की यात्रा के बाद मिली राशि से एक बिगुल खरीदा जा सका।
यह पूरी घटना के.आर. मलकानी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘The RSS Story’ में विस्तार से लिखी है। इससे संघ का मूल सिद्धांत सामने आता है “संघ को मनी नहीं, मैन चाहिए।” यानी संगठन धन की तुलना में स्वयंसेवक शक्ति को प्राथमिकता देता है।
क्यों नहीं लेता RSS बाहरी दान या चंदा?
जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार संघ चला रहे थे, उस समय पंडित मदन मोहन मालवीय, जिन्हें ‘मनी मेकिंग मशीन’ कहा जाता था, ने संघ के लिए धन जुटाने का प्रस्ताव दिया। लेकिन डॉ. हेडगेवार ने साफ कहा “हमें धन नहीं, स्वयंसेवक चाहिए।”
इसके पीछे तीन प्रमुख वजहें थीं: संगठन किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भर न रहे क्योंकि चंदा लेने से व्यक्ति या समूह का प्रभाव बढ़ सकता था, जिससे संघ की स्वतंत्रता प्रभावित होती। दूसरा सनातन परंपराओं के अनुसार आगे बढ़ना, हेडगेवार चाहते थे कि संघ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से संचालित हो। और तीसरा पारदर्शिता और समानता बरकरार रखना: अगर बाहरी दान लिया जाता तो सवाल, विवाद और आरोप सामने आ सकते थे।
इसलिए 1925–1928 के बीच लंबी चर्चाओं के बाद तय हुआ कि स्वयंसेवक ही हर साल ‘गुरुदक्षिणा’ देंगे, वह भी गुप्त रूप में। लॉटरी, ड्रामा टिकट या सार्वजनिक चंदा—हर विकल्प खारिज कर दिया गया।

कैसे शुरू हुई पहली ‘गुरुदक्षिणा’ की परंपरा?
1928 में गुरु पूर्णिमा के दिन डॉ. हेडगेवार ने नागपुर की सभी शाखाओं को निर्देश दिया कि हर स्वयंसेवक फूल और श्रद्धानुसार गुरुदक्षिणा लेकर आए। स्वयंसेवक यह सोचकर उलझन में थे कि गुरुदक्षिणा किसे देंगे? कई को लगा, शायद डॉ. हेडगेवार स्वयं ‘गुरु’ होंगे। लेकिन जब शाखा में सब इकट्ठा हुए तो उन्हें भगवा ध्वज के सामने गुरुदक्षिणा अर्पित करने को कहा गया। डॉ. हेडगेवार ने कहा “कुछ भी महान व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। इसलिए हमारा गुरु कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि भगवा ध्वज होगा।”
यह घोषणा संघ की विचारधारा का आधार बन गई। पहली गुरुदक्षिणा में कुल 84 रुपये 50 पैसे एकत्र हुए—जो आज के समय में लगभग 10–15 हजार रुपये के बराबर है। कुछ स्वयंसेवकों ने आधे पैसे तक की गुरुदक्षिणा दी—यह समानता का प्रतीक था। आज भी RS S इसी गुरुदक्षिणा पर चलता है, सैकड़ों प्रचारक, कार्यालय और गतिविधियाँ सिर्फ स्वयंसेवकों के योगदान से संचालित होती हैं। 2017 के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ दिल्ली में 95 हजार से अधिक लोगों ने गुरुदक्षिणा दी थी।
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