
शादी सीजन में नए नोटों की किल्लत, बैंकों में सूखा, बाजार में ‘ब्लैक’ का खेल…!
‘क्लीन नोट पॉलिसी’ पर सवाल: जब बैंकों में नहीं तो बाजार में कैसे पहुंच रहे हैं बंडल?
10-20-50 के नोटों की गड्डियां 300 से 1500 रुपए तक प्रीमियम पर बिक रहीं
राजस्थान में आपूर्ति ठप, दूसरे राज्यों से मंगवाए जा रहे नोट?
विजय श्रीवास्तव,
जयपुर,dusrikhabar.com। शादी-विवाह के चरम सीजन में नए नोटों की किल्लत ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। दूल्हा-दुल्हन पक्ष को रस्मों, मिलनी, नाच-गाने और माला बनाने के लिए 10, 20, 50, 100 और 500 रुपए के नए नोटों की गड्डियां चाहिए, लेकिन बैंकों में ये नोट नदारद हैं। हैरानी की बात यह है कि जहां बैंक हाथ खड़े कर रहे हैं, वहीं बाजार में यही नोट ‘ब्लैक’ में ऊंचे दामों पर उपलब्ध हैं। सवाल उठता है कि जब बैंक खाली हैं तो बाजार तक ये नई करेंसी पहुंच कैसे रही है?
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बैंकों के चक्कर, लेकिन हाथ खाली
सुबह से शाम तक लोग अलग-अलग बैंक शाखाओं के चक्कर लगा रहे हैं। नए नोटों की गड्डियां लेने पहुंचे ग्राहकों को हर जगह निराशा ही मिल रही है। अधिकांश बैंकों में सिर्फ 500 रुपए के नए नोट उपलब्ध बताए जा रहे हैं, जबकि 10, 20, 50 और 100 के नोटों की भारी कमी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर है। 10 रुपए के नए नोटों की मांग सबसे ज्यादा है क्योंकि शादी की रस्मों में इनका खास उपयोग होता है। एक ग्रामीण उपभोक्ता रामलाल का कहना है कि एसबीआई, पीएनबी, आईडीबीआई, आईसीआईसीआई, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और सेंट्रल बैंक की कई शाखाओं में नए नोटों की गड्डियां उपलब्ध नहीं हैं। लोग एक बैंक से दूसरे बैंक तक भटक रहे हैं, लेकिन नए नोटों की सप्लाई नहीं मिल पा रही।
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बाजार में ‘प्रीमियम’ पर नोट: 500 से 1500 तक अतिरिक्त वसूली
जहां बैंक असमर्थता जता रहे हैं, वहीं बाजार में कुछ नोट विक्रेता खुलेआम नए नोटों की गड्डियां बेच रहे हैं।
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10 रुपए के नोटों की गड्डी 500 रुपए अतिरिक्त देकर मिल रही है।
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20 रुपए की गड्डी 300 रुपए प्रीमियम पर।
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50 रुपए के नए नोटों की गड्डी भी 300 रुपए ज्यादा देकर उपलब्ध करवाई जा रही है।
कुछ मामलों में 10 रुपए की गड्डी 1500 रुपए तक अतिरिक्त वसूली के साथ बेचे जाने की भी चर्चा है। मजबूरी में लोग फटे-पुराने नोट बदलने वालों या दलालों से ऊंचे दाम पर नई करेंसी खरीद रहे हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर ब्लैक में नोटों की बिक्री की ओर इशारा करती है।
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‘क्लीन नोट पॉलिसी’ के बावजूद संकट क्यों?
भारतीय रिजर्व बैंक की क्लीन नोट पॉलिसी के तहत बैंकों को साफ और नए नोटों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश हैं। फिर भी हालात उलट क्यों हैं? जानकार सूत्रों का दावा है कि कुछ बैंक शाखाओं में ‘सेटिंग’ के जरिए नोटों के बंडल बाजार के कारोबारियों तक पहुंचाए जा रहे हैं। यही कारोबारी सीजन के समय मोटी रकम वसूल कर नई करेंसी उपलब्ध कराते हैं।
एक बैंक के वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर खुलासा किया कि दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में नए नोटों की कमी नहीं है। वहां से भी नोटों के बंडल मंगवाए जा रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान में पिछले दीपावली के बाद से रिजर्व बैंक की ओर से नए नोटों के बंडल जारी नहीं किए गए हैं। संभावना जताई जा रही है कि प्रिंटिंग प्रेस से राजस्थान को पर्याप्त सप्लाई नहीं मिल रही। कुछ बैंक अधिकारियों का आरोप है कि राजस्थान के साथ वितरण में असमानता बरती जा रही है।
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बड़ा सवाल: सिस्टम में सेंध या आपूर्ति में असमानता?
जब दूसरे राज्यों में संकट नहीं है, तो राजस्थान में ही नए नोटों की भारी किल्लत क्यों?
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क्या वितरण प्रक्रिया में गड़बड़ी है?
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क्या बैंक स्तर पर मिलीभगत से नोट बाजार में डायवर्ट हो रहे हैं?
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या फिर रिजर्व बैंक की आपूर्ति नीति में राज्यवार असंतुलन है?
यह मामला केवल सुविधा का नहीं, बल्कि पारदर्शिता और वित्तीय प्रशासन की विश्वसनीयता का भी है।
आम जनता ठगा महसूस कर रही
बैंकों की इस उलझी राजनीति और आपूर्ति के गणित में सबसे ज्यादा नुकसान आम उपभोक्ता को उठाना पड़ रहा है। लोग उम्मीद करते हैं कि जरूरत के समय बैंक उन्हें नई करेंसी उपलब्ध कराएंगे, लेकिन मौजूदा हालात में वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करते हुए रिजर्व बैंक को निर्देश देने चाहिए ताकि सभी राज्यों में नए नोटों का समान वितरण सुनिश्चित हो सके और बाजार में चल रहे इस ‘ब्लैक गेम’ पर रोक लगे।
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